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प्रजापिता ब्रह्मा (आदि देव /पिताश्री- विश्व पिता)

संसार इनको अनेकों शास्त्रों के अनुसार आदि देव या आदम के नाम से याद करता है। वेदानुसार ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता कहा गया हैं। हम अब समझते हैं कि निराकार परमात्मा (शिव), ब्रह्मा के द्वारा नई दुनिया की रचना करते हैं। ब्रह्मा बाबा का जीवन कितना साधारण व सेवार्थ था, जैसा कि बड़ी दादियों ने बताया, और मुरली व बाबा के लिखित पत्रों से जाना, यह इस जीवनी में लिखित है।

लौकिक जीवन

ब्रह्मा बाबा का लौकिक नाम लेखराज कृपलानी था एवं उनका जन्म 15 दिसंबर 1884 को सिन्ध, हैदराबाद (वर्तमान समय पाकिस्तान में) पिता खूबचंद कृपलानी के घर में हुआ था, जो की एक ग्रामीण पाठशाला के हेडमास्टर थे। लेखराज की माँ का देहान्त, उनकी अल्पायु में ही हो गया था। करीबन २० साल की आयु में पिता खूबचंद का भी देहान्त हुआ, जिसके बाद लेखराज ने कुछ वर्ष अपने काका की अनाज़ की दूकान पर काम किया।  बड़े होकर उन्होंने हीरे परखने की, जवेरी की कला सीखी और समय के साथ कलकत्ता के नामचीन हीरे के व्यापारी बन गए।  उनका व्यापार मुंबई तक भी पंहुचा। समाज में भी उनका बड़ा मान था, व उनको लोग आदर से लखी दादा कहते थे।  जब उनकी आयु ६० साल के करीब रही होंगी, तो परमात्मा (शिव बाबा) में उन्हें कुछ साक्षातकार करवाए, जिसके बाद यह कहानी शरू होती है (विस्तार में जानने लिए हमारे हिस्ट्री पेज पर जाये)

Brahma Baba - Brahma Kumaris

ओम मण्डली और आदि यज्ञ

1935 -36 से ही दादा लेखराज को परमात्मा द्वारा साक्षात्कार होने लगे थे।  उस समय उनको यह निश्चय नहीं था कि यह सब कौन कर रहा है। दैवीय प्रेरणानुसार दादा लेखराज एक पाठशाला का आरम्भ कर, आने वाले बच्चों को गीता के पाठ व आध्यात्मिक संस्करण सुनाने लगे थे।  इस पाठ का आरम्भ ही गीता के रचयिता श्री कृष्ण नहीं बल्कि निराकार परमात्मा शिव हैं, की व्याख्या से हुआ था।  इस संगठन को 'ॐ मंडली' के नाम से जाना लगा, क्यूंकि वहा ओम शब्द का उच्चारण होता और आने वालो में से कई माताए व बच्चे व बुजुर्ग ध्यान में चले जाते थे। विस्तार से हमारे History पेज पर जाने।

ईश्वरीय प्रेरणा-अनुसार, दादा लेखराज ने अपनी सारी ही सम्पत्ति कुछ समर्पित माताओं व कुमारियों की एक ट्रस्ट बनाकर उसमे दे दी।  यह यज्ञ माताओं द्वारा संभाला जाने लगा और एक रूहानी यात्रा का आरम्भ हुआ। जो समर्पित थे, वे आकर कराची (पाकिस्तान) में बस गये और 14 वर्ष स्वपरिवर्तन हेतु तपस्या में बिताये।  ब्रह्मा बाबा के बचपन से 1936 की कहानी, फिर साक्षातकार और ओम मंडली किस प्रकार निर्मित हुई, इससे सम्बंधित विडिओ निचे दिया है।

बच्चो के ब्रह्मा बाबा ➞

1952 से सेवा में वृद्धि हुई एवं सम्पूर्ण भारत से जिज्ञासु सेवाकेन्द्रों में आने लगे। बापदादा द्वारा लिखित पत्र भारत के सभी सेवाकेन्द्रों में रहने वाले फरिश्तों के मार्गदर्शक बने।

व्यक्तित्व व गुण (ब्रह्मा बाबा के सन्दर्भ में)

ब्रह्मा बाबा, जिनको 1948 में यह नाम दिया गया, एक विशेष आत्मा जिसने अपने जीवन में एक श्रेष्ठ एवं अनोखा पार्ट निभाया। वे वह भाग्यशाली रथ बने जिन द्वारा परमात्मा ने मनुष्य मात्र को सत्य ज्ञान प्रदान किया, और नयी दुनिया की स्थापना करवाई। ब्रह्मा बाबा के गुण अतुलनीय थे। चाहे धन-संपत्ति हो, चाहे प्रसिद्धि हो या शारीरिक विश्राम हो, ब्रह्मा बाबा ने ईश्वरीय कार्य-अर्थ त्याग किया।

 

कई वरिष्ठ दादियां जो यज्ञ में बाबा के साथ रही, आज तक उनके असाधारण, प्रतापी, व मीठे व्यक्तित्व को याद करती हैं।  बाबा से जब भी कोई मिलता तो बाबा उसकी पसंद-नापसंद पूछ अवश्य ही कुछ सौगात देते थे और एक व्यक्तिगत सम्बन्ध जोड़ देते। संक्षेप में बाबा हर एक से मीठे वचन व कर्म-व्यवहार द्वारा समीप का सम्बन्ध बना लेते थे। बाबा के राजसी व्यक्तित्व का तेज उनके चेहरे से झलकता था। उन्हें हर समय नई दुनिया में कृष्ण के रूप में जन्म लेने का नशा चढ़ा रहता था।  यह नशा अलौकिक था इसलिए बाबा सदैव अहंकार मुक्त रहते थे। सरल व साधारण जीवन शैली द्वारा बाबा ने सदैव सबको परमात्मा का मार्ग दिखाया, अर्थात शिव बाबा का सन्देश दिया। जो भी बाबा से मिलता, उनके गुणों को अपने ह्रदय में समा लेता था।

 

विश्व पिता होने के नाते बाबा करुणा व दया भाव से भरपूर थे। बाबा को जब भी किसी बच्चे के दर्द में होने का समाचार पत्र द्वारा मिलता, तो बाबा रात में सो नहीं पाते थे। बाबा उस बच्चे को शक्तिशाली बनाने के लिए सकाश देते।  बाबा को यज्ञ में अनेकों विघ्न आये, जिनका सामना उन्होंने परमात्मा (शिव बाबा) की श्रीमत पर चलते-चलाते किया और सफलतापूर्वक विघ्नो को पार भी किया।

जिम्मेवार और प्रेम स्वरुप

जब मम्मा 1965 में अव्यक्त हुईं तो बाबा पर यज्ञ की जिम्मेदारियां बढ़ गयीं दूसरी तरफ नये - नये सेवाकेंद्र भी खुलने लगे। अनेक बच्चों के पत्र रोज़ बाबा के पास आते ,जिनका उत्तर बाबा, स्वयं समय मिलने पर देते। उनका एक भी पल व्यर्थ नहीं जाता था।  बाबा का दिनचर्या व्यस्त रहने के बावजूद भी बाबा हमेशा सभी से मिलते और हर एक पर प्यार बरसाते  उनके प्यार और पालना को आज भी सभी वरिष्ठ बी.के भाई बहन याद करते हैं।  देखिये इस वीडियो में प्रजापिता ब्रह्मा की जीवन कहानी (animated)

अंतिम दिनों में बाबा अपनी जिम्मेदारियों से भी न्यारे होने लगे। सभी दादियों में जिम्मेदारियां बाँट कर बाबा ने अपना अंतिम वर्ष मधुबन मे गहन तपस्या में बिताया।  जनवरी 1969 में बाबा अपनी अंतिम कर्मातीत अवस्था को प्राप्त कर इस साकारी दुनिया से न्यारा होकर अव्यक्त बन गए। बच्चे अब यह समझते हैं कि यह कार्य शिव बाबा ने ही ब्रह्मा बाबा द्वारा कार्यान्वित किया जिससे सेवायें बेहद में बढ़ें। बापदादा (गॉडफादर शिव, और पहला मनुष्य ब्रह्मा का संयुक्त रूप) ने गुलज़ार दादी के माध्यम से अपने बच्चों को समर्थ व सशक्त बनाने हेतु मुरली सुनाना जारी रखा, और भारत के बाहर भी अब सेवाकेन्द्रों की स्थापना होने लगी।  इस प्रकार हमने समझा की ब्रह्मा बाबा अब सूक्ष्म वतन से अपना पार्ट बजा रहे हैं।

"निर्विकारी, निरहंकारी, निराकारी बनो" ~ यह प्रजापिता ब्रह्माबाबा के अंतिम बोल रहे।

पदचिह्न

ब्रह्मा बाबा के पदचिह्नों को फॉलो कर आज लाखों मनुष्य आत्माए इस ईश्वरीय ज्ञान को प्राप्त कर, जीवन जीने का आदर्श मार्ग अपना रही हैं। अर्थात अपने को आत्मा जान, ब्रह्माकुमारी व ब्रह्माकुमार, ईश्वरीय श्रीमत अनुसार स्वयं के और दुसरो के कल्याण अर्थ तत पर है। और इस आध्यात्मिक मार्ग पर हमारा साथी हैं स्वयं परमात्मा, शिव बाबा जो हमारा अविनाशी रूहानी-बाप, परम शिक्षक व सतगुरु हैं।

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