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- BK murli today in Hindi 13 June 2018 - Aaj ki Murli
Brahma Kumaris murli today in Hindi - Aaj ki Murli - BapDada - madhuban - 13-06-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन “मीठे बच्चे-तुम सबका प्राण आधार आया है तुम्हें जमघटों के दु:खों की पीड़ा से छुड़ाने, वह तुम्हें स्वर्ग का वर्सा देता, वह सर्वव्यापी नहीं है” प्रश्न: इस राजयोग में कौन-सा योग सदा कम्बाइण्ड है? उत्तर- इस राजयोग में प्रजायोग सदा ही कम्बाइण्ड है क्योंकि राजा-रानी के साथ-साथ प्रजा भी चाहिए। अगर सब राजा बन जायें तो किस पर राज्य करेंगे? सब कहते हैं हम महाराजा-महारानी बनेंगे, हम राजयोग सीखने आये हैं। परन्तु राजा-रानी बनने के लिए तो बहुत हिम्मत चाहिए। पूरा बल होना चाहिए। बाप पर पूरा-पूरा बलि चढ़े तब राजाई में जा सकें। गीत: प्रीतम आन मिलो... ओम् शान्ति।प्रीतम को कौन बुलाते हैं? प्रीतमा को सजनी वा भक्ति कहा जाता है। बुलाते हैं साजन को, भगवान को अथवा बाप को। इसमें सर्वव्यापी का ज्ञान तो ठहरता नहीं। प्रीतम को बुलाते हैं कि आन मिलो। जीव-आत्मायें अपने परमपिता परमात्मा को बुलाती हैं-ओ परमपिता परमात्मा आओ, रहम करो। स्वर्ग में तो ऐसे नहीं बुलायेंगे। बरोबर यह दु:खधाम है तो प्रीतम को बुलाते हैं। प्रीतम भगवान एक है। क्रियेटर एक है। विश्व अथवा सृष्टि का चक्र भी एक है। बच्चे जानते हैं कि कलियुग से फिर सतयुग होगा। सतयुग में फिर से एक आदि सनातन देवी-देवताओं का राज्य होगा। यह नॉलेज है ना। तुम बच्चे जानते हो प्रीतम कैसे आये हैं। शिव तो है निराकार। तुम सब निराकारी आत्मायें हो। यहाँ आये हो पार्ट बजाने। अब निराकार बाप कैसे आया? राजयोग किसने सिखलाया? कृष्ण तो नहीं सिखला सकता। वह तो सतयुग स्थापना करने वाला नहीं है। उनको रचता नहीं कहेंगे। सभी जीव आत्माओं का प्रीतम एक परमपिता परमात्मा क्रियेटर निराकार को कहेंगे। कहते हैं-मेरा जन्म शिव जयन्ति मनाते हैं। मेरा जन्म कोई कृष्ण सदृश्य नहीं होता। कृष्ण कैसे माँ के गर्भ से जन्म लेता है-वह भी बच्चों को साक्षात्कार कराया हुआ है। बाप कहते हैं मेरा नाम रूद्र भी है। गीता में भी है - यह है रूद्र ज्ञान यज्ञ अर्थात् शिव का रचा हुआ यज्ञ। तो जरूर निराकार शिव को साकार में आना पड़े। बाप बैठ समझाते हैं-इस गीत के दो अक्षर से ही सर्वव्यापी का ज्ञान निकल जाता है। प्रीतम को कृष्ण नहीं कहेंगे। कहते ही हैं-ओ गॉड फादर। ओ प्राण आधार क्योंकि यह सबका प्राण आधार है। सभी को जमघटों के दु:ख की पीड़ा से छुड़ाते हैं, तो जरूर उनको आना पड़े। बाप कहते हैं मैं कल्प-कल्प कल्प के संगमयुगे आता हूँ। यही कल्याणकारी संगमयुग है। सतयुग के बाद तो फिर दो कला कम हो जाती हैं। यही संगमयुग चढ़ती कला का युग है, इसमें बुद्धि से काम लेना चाहिए। नये के लिए तो बहुत सहज समझाते हैं। तुम्हारा बाप निराकार परमपिता परमात्मा शिव है। उनको याद करो, बस। और गुरू गोसाई आदि के मन्त्र सब हैं भक्ति मार्ग के। भक्ति आधा-कल्प चलती है फिर ज्ञान का वर्सा आधा-कल्प चलता है। ज्ञान वहाँ नहीं रहेगा। ज्ञान दिया जाता है दुर्गति से सद्गति में ले जाने के लिए। गुरू का काम है शिष्य अथवा फालोअर्स की गति-सद्गति करना। परन्तु वह जानते नहीं कि गति-सद्गति क्या होती है। गाते भी हैं सर्व का सद्गति दाता राम। पतितपावन सर्व सीताओं का राम। बच्चे जानते हैं कि सतयुग में एक ही धर्म रहता है। सूर्यवंशी राज्य चलता है। फिर राम राज्य त्रेता में दो कला कम हो जाती हैं। वहाँ रावण आदि होते नहीं। कोई उपद्रव की बात नहीं। यह सारी दुनिया लंका है, रावण का राज्य है। इस समय सब मनुष्य बन्दर से बदतर हैं क्योंकि सभी में 5 विकार प्रवेश हैं। कितना मनुष्यों में क्रोध है। एक दो को कैसे मारते हैं। मरने-मारने की तैयारी करते हैं। तुम सब विकारी थे। अब बाबा आकर रावण पर जीत पहनाते हैं। शास्त्रों में क्या-क्या बातें लिख दी हैं। ऐसे थोड़ेही पूंछ को आग लगी और सारी लंका जल गई। वास्तव में लंका यह सारी दुनिया है। तुम ब्राह्मण कुल भूषण बच्चे भी पहले पतित थे। अभी तुम माया रावण पर जीत पाते हो। बाप ने आकर बुद्धि का ताला खोला है। बुद्धिवानों की बुद्धि बाप है ना। मनुष्य तो क्या-क्या बातें सुनाकर माथा ही खराब कर देते हैं। बाप कहते हैं यह फिर भी होना ही है। सर्वव्यापी का ज्ञान पहले नहीं था। कहते थे परमात्मा बेअन्त है। बेअन्त कह फिर उनको सर्वव्यापी कहना कितनी बड़ी भूल है। शिवोहम् ततत्वम् कह देते हैं। कभी शिवोहम्, कभी फिर ब्रह्मोहम् भी कह देते। यह फिर राँग हो जाता है। ब्रह्म तो रहने का स्थान है। शिव बाबा ब्रह्म तत्व में रहते हैं इसलिए उनका नाम ब्रह्माण्ड है। हम आत्मायें भी वहाँ की रहने वाली हैं। वे लोग फिर शिव को नाम-रूप से न्यारा कह देते हैं, यह सब समझाने की बातें हैं ना सो भी जब एक हफ्ता रेगुलर समझें तब ज्ञान से चोली रंग जाये। समझाना है तुम्हारा बेहद का बाप भी है, जिससे भारत को जीवन्मुक्ति का वर्सा मिलता है। बाकी सबको मुक्ति का वर्सा मिलता है। बाप कहते हैं-बच्चे, अभी नाटक पूरा हुआ। तुम्हारे 84 जन्म पूरे हुए हैं। इतना समय पार्ट बजाया है, अब फिर वापस जाना है। बाप आकर हमारे लिए राजधानी स्थापना करते हैं तो जरूर संगम पर स्थापना हो, तब तो सतयुग में तुम वर्सा लो। तुमको कितना अच्छा कर्म सिखलाते हैं। लक्ष्मी-नारायण ने क्या किया जो ऐसे ऊंच बनें? अभी तुम जानते हो बाबा राजयोग सिखलाते हैं। सतयुग में थोड़ेही सिखलायेंगे। वहाँ तो है ही लक्ष्मी-नारायण का राज्य। यह है कल्याणकारी संगमयुग, इसमें अच्छी रीति पुरूषार्थ करना है। बाप कहते हैं यह देह का भान छोड़ अपने को आत्मा निश्चय कर मुझ बाप को याद करो। तुम धक्के खाकर थक गये हो। ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण-ब्राह्मणियाँ ही त्रिकालदर्शी बनते हैं। बनाने वाला है बाप। स्वदर्शन-चक्र भी तुम फिराते हो। विष्णु कोई त्रिकालदर्शी नहीं है। उन्होंने फिर विष्णु को अलंकार दे दिये हैं। वास्तव में त्रिकालदर्शी तुम ब्राह्मण बनते हो। वर्णों का भी समझाया है। चोटी है ब्राह्मण वर्ण। भारतवासी चित्र बनाते हैं। चोटी देते नहीं। ब्राह्मण वर्ण गुम कर दिया है। प्रजापिता ब्रह्मा है ना। तो पहले ब्राह्मणों की चोटी होनी चाहिए। इस समय सभी शूद्र हैं। तुम मुख वंशावली ब्राह्मण बने हो। गीत में भी सुना-प्रीतम आन मिलो... सर्वव्यापी की बात नहीं। अभी तुम प्रीतमायें प्रीतम के सम्मुख बैठी हुई हो। प्रीतम अपना स्वर्ग का वर्सा दे रहे हैं। कितना अच्छा प्रीतम है! कहते हैं कृष्ण ने भगाया पटरानी बनाने। परन्तु समझते नहीं-पटरानी क्या चीज होती है। अभी तुम जानते हो और स्वर्ग का महाराजा-महारानी बनने लिए पुरूषार्थ करते हो। यह राजयोग है, इसमें प्रजायोग कम्बाइण्ड है। सिर्फ राजा-रानी थोड़ेही बनेंगे। सब कहते हैं महाराजा-महारानी बनेंगे। हम आये हैं राजयोग सीखने, परन्तु सब थोड़ेही महाराजा-महारानी बनेंगे। हिम्मत चाहिए। पूरा बल होना चाहिए। भक्ति मार्ग में जब नौधा भक्ति करते हैं तब साक्षात्कार होता है। शिव पर बलि चढ़ते हैं। वास्तव में बलि चढ़ना भी यहाँ की बात है। यह भी समझाया है-गीता, भागवत, रामायण, वेद आदि सतयुग-त्रेता में होते नहीं। ऐसे नहीं परम्परा से यह कोई चले आते हैं। यह तो द्वापर से चले हैं। फिर द्वापर में ही बनेंगे। मुसलमानों ने आकर राज्य लिया, मुहम्मद गजनवी ने लूटा-यह सब बातें तुम जान गये हो। हमने ही पूज्य से पुजारी बन अपना मन्दिर बनाया। तो कितनी हमको मिलकियत होगी! पाँच हजार वर्ष की बात है। सो भी शुरूआत में। फिर भक्ति मार्ग में भी तुमको कितना धन रहता है! जिसने हीरों-जवाहरों का मन्दिर बनाया, उनका अपना महल क्या होगा। नाम कितना ऊंच है। लक्ष्मी-नारायण कितने श्रृंगारे हुए देखते हो। अभी तो बिचारों के पास पैसा नहीं है। आगे तो लक्ष्मी-नारायण के लिए हीरों का सब कुछ बनाते थे। बाद में सब लूट फूट ले गये। वहाँ तो सोने की ईटें होती हैं, तुम उनसे महल बनाते हो। अक्ल भी अच्छा रहता है। अभी तो बेअक्ल हैं, तब तो कंगाल हुए हैं ना। शिवबाबा पर वा देवताओं पर कितने कलंक लगाये हैं इसलिए बाबा कहते हैं यदा यदाहि.... जब इसमें प्रवेश करूँ तब तो ब्राह्मणों को रचूँ। ब्रह्मा मुख से भारत में ही आकर ब्राह्मण रचते हैं। विलायत जाऊंगा क्या। जो नम्बरवन पावन पूज्य था, अब पुजारी बना है, उनके ही पतित शरीर में आता हूँ। त्रिमूर्ति कहते हैं, शिव को निकाल दिया है। त्रिमूर्ति ब्रह्मा का तो अर्थ ही नहीं निकलता। बाबा कहते हैं कल्प-कल्प संगम पर इस तन में आकर तुम ब्राह्मणों को रचता हूँ। तुम ब्राह्मण-ब्राह्मणियों का यह सर्वोत्तम युग है। अभी तुम ईश्वरीय गोद में हो। ईश्वर बाबा से बेहद का वर्सा लेते हो। जानते हो उनको ही याद करते-करते हम उनके पास पहुँच जायेंगे। कहते हैं ना अन्त काल जो स्त्री सुमिरे.... जैसा सुमिरन वैसा जन्म मिलता है। यह है अन्तकाल का समय। तुमको बाप बैठ समझाते हैं। इस समय मुझ बाप को ही याद करना है। देही-अभिमानी भव, अशरीरी भव। अपने को आत्मा निश्चय कर मुझ परमपिता परमात्मा को याद करो। एक जगह नेष्ठा में नहीं बैठना है। बच्चे तो चलते-फिरते, उठते-बैठते बाप को याद करते हैं ना। बेहद का बाप कहते हैं-और सभी से बुद्धि निकाल मामेकम् याद करो। इसी में मेहनत है। 84 जन्म लिए, अब यह अन्तिम जन्म है। तुम बाप के बने हो तो उसने ही कितने मीठे नाम दिये हैं। बाबा ने सन्देशी द्वारा नाम भेजे। वहाँ बहुत अच्छे-अच्छे नाम होते हैं। फिर भी वही नाम पड़ेंगे जो कल्प पहले पड़े होंगे। सर्वव्यापी का अर्थ भी समझाना चाहिए ना। सब भक्त भगवान हैं तो फिर उनको मिलेगा क्या। कुछ भी नहीं। अभी तुम ईश्वरीय गोद में हो। ईश्वरीय गोद से तुम ब्राह्मण बनते हो। शूद्र वर्ण खत्म हुआ। यह वर्ण है ही तुम भारतवासियों के लिए। तुम जानते हो हम शूद्र वर्ण से ट्रान्सफर हो ब्राह्मण धर्म में आये हैं। ब्राह्मण-ब्राह्मणियाँ वही बनेंगे जो कल्प पहले बने थे। झाड़ वृद्धि को पाता जाता है। कितनी अच्छी- अच्छी बातें बच्चों को सुनाते हैं। परन्तु माया का तूफान लगने से अच्छे-अच्छे बच्चे भी गिर पड़ते हैं। युद्ध तो है ना। तुम सर्वशक्तिमान के बच्चे हो तो माया भी कम नहीं है। आधा-कल्प रावण का राज्य है। इस समय माया भी जोर से पछाड़ेगी, इसको तूफान कहा जाता है। हनूमान का मिसाल है ना। तुमको माया के कितने भी तूफान आयें परन्तु हिलना नहीं है। सदैव हर्षित रहना है। जितना रूस्तम बनेंगे उतना माया जोर से वार करेगी। देखेगी-लायक है वा नहीं? कहते हैं-बाबा, हमने तो काला मुंह कर दिया। काला मुंह हुआ, बस, बुद्धि को ताला लग जायेगा। धारणा होगी नहीं क्योंकि बाबा को कलंक लगाया ना। लौकिक बाप भी कहते हैं ना तुम कुल-कलंकित हो। बाबा समझाते हैं-तुम कभी भी व्ल कलंकित नहीं बनना। बाप परमधाम से आये हैं तुमको पढ़ाने। भगवानुवाच-मैं राजाओं का राजा बनाने आया हूँ। राजाई जरूर स्थापना होगी। इस समय तुम जितने ब्राह्मण बने हो उतने ही बने थे और बनते रहेंगे। बच्चों को याद रखना है कि उस पारलौकिक बाबा का कोई बाप नहीं है। वह है ही सुप्रीम नॉलेजफुल, मनुष्य सृष्टि का बीजरूप चैतन्य, पतित-पावन, रहमदिल, नॉलेजफुल, ब्लिसफुल। उन पर कोई ब्लिस करने वाला नहीं है। वह खुद ही बाप, टीचर, सतगुरू है। बेहद बाप के घर में तुम सम्मुख बैठे हो। यह है ईश्वरीय कुटुम्ब। वृद्धि को पाते जायेंगे। 84 का चक्र भी बुद्धि में याद है। हम सो देवता इतने जन्म, हम सो क्षत्रिय इतने जन्म.... फिर हम सो देवता बनेंगे। माया दु:खधाम बनाती है। बाप आकर सुखधाम बनाते हैं। कितना सहज है। खूब पुरूषार्थ करना चाहिए। अब का पुरूषार्थ कल्प-कल्प के लिए तुम्हारा पुरूषार्थ बन जायेगा। कहेंगे कल्प कल्पान्तर हम ऐसा पुरूषार्थ करते आये हैं। मम्मा-बाबा भी पुरूषार्थ करते हैं। यही फिर पूज्य सो देवी-देवता लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। श्रीमत पर हम श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ बनते हैं। अच्छा!मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते। धारणा के लिए मुख्य सार: 1) इस अन्तकाल के समय में एक बाप को ही याद करने का अभ्यास करना है। अशरीरी बनना है। 2) कभी भी कुल कलंकित नहीं बनना है, माया के तूफानों में हिलना नहीं है। सदा हर्षित रहना है। वरदानः कम्बाइन्ड रूपधारी बन सेवा में खुदाई जादू का अनुभव करने वाले खुदाई खिदमतगार भव l स्वयं को सिर्फ सेवाधारी नहीं लेकिन ईश्वरीय सेवाधारी समझकर सेवा करो। इस स्मृति से याद और सेवा स्वत: कम्बाइन्ड हो जायेगी। जब खुदा को खिदमत से जुदा कर देते हो तो अकेले होने के कारण सफलता की मंजिल दूर दिखाई देती है इसलिए सिर्फ खिदमतगार नहीं, लेकिन खुदाई खिदमतगार हूँ-यह नाम सदा याद रहे तो सेवा में स्वत: खुदाई जादू भर जायेगा और असम्भव भी सम्भव हो जायेगा। स्लोगनः कर्मयोगी बनना है तो कमल आसनधारी (न्यारे और प्यारे) बनो। #bkmurlitoday #Hindi #brahmakumaris
- BK murli today in English 18 June 2018
Brahma Kumaris murli today in English - 18/06/18 Morning Murli Om Shanti BapDada Madhuban Sweet children, you have taken God’s lap in order to become deities from human beings. It is His shrimat that makes you into deities from human beings. Question: What is the meaning of, “When you die, the world is dead for you.”? Answer: When you children come to the Father and die a living death, the whole world is finished for you. Other human beings take birth in the same world in which they die, but you will not take birth in this old world. You will take a new birth in the new world. You children receive the kingdom of heaven. Song: To live in Your lane and die in Your lane. Om Shanti. This song applies to the present time, and it is later sung on the path of devotion. At this time, when you come to the Father and die a living death, the whole world is definitely finished for you. On a non-gyani path of ignorance, when people die, they take rebirth in that same world. The world exists for ever. People take birth in the same world in which they die. When you children belong to the Father, this whole world is finished for you. There is a saying: “When you die, the world is dead to you”, but the world is not destroyed. It is in this world that you have to take birth again. Since you have now died a living death, you die and this world also finishes. When you die, the world will also finish. You understand that you will go into the new world again. Only you Brahmins understand this. Because of being God’s children, you receive your birthright of the golden age. Hell is destroyed and you receive the sovereignty of heaven. There is no effort in this; you simply have to remember the Father. When a person is about to die, he is told to chant: “Chant Rama, Rama”. Later, at the time of carrying the body to the cremation ground, they say: The name of Rama is the Truth. It is of God that they say that Rama’s name is the Truth. It means: Take the name of the Supreme Father, the Supreme Soul, the One who is the Truth. They call him Rama. They even chant the name “Rama, Rama” while rotating the beads of a rosary. They chant Rama’s name as though they are playing a musical instrument. Baba explains to you children that you do not have to make any sound, but you simply have to keep remembrance in your intellects. You understand that, by your coming into God’s lap and dying a living death, this world of sorrow ends for you. “Baba, we will become the garland around Your neck.” The Rosary of Rudra is remembered. It is not said: Rosary of Rama or Rosary of Krishna. You are sitting in this sacrificial fire of the knowledge of Rudra in order to become threaded in the rosary of Rudra, as you did a cycle ago. There is no other satsang in which they believe that they are to be threaded in the garland around God, the Father’s, neck. You definitely receive your inheritance from the Father. Who says, “Father”? The soul. The mind and intellect are in the soul. The intellect first understands and then speaks. First the thought arises, and then it is expressed through the organs that we definitely belong to Baba and that we will remain Baba’s. When they speak of God, the Father, ask them: Do you have any knowledge of God, the Father? They would reply that God is omnipresent. Tell them: Your soul says that the Supreme Father, the Supreme Soul, is your Father. Therefore, how can He be omnipresent? Has the Father entered the children? It is completely wrong to call the Father omnipresent. A worldly father has five or seven children. Would they ask him: Father, are you omnipresent? This is something to be understood. You say “Supreme Father” with your mouth. So, how can He be omnipresent? How it is possible for the Father to be in me? The child would say “The Father has entered me.” The child would not say “I am the Father." You souls are His children, and yet you say that the Father is in you! How could the Father be in the child? You have to understand these things very clearly and explain them to others. The sacrificial fire of the knowledge of Rudra is famous. Rudra is incorporeal. Krishna is corporeal. Ultimately, who can be called God? Krishna cannot be called God. Human beings have forgotten everything. They say: “God, the Father, is omnipresent. He is also in me.” The Father lives in His home; where else would He live? The Father has now come into this unlimited home. He is present here. He says: I have entered this one. Ask whatever you want. Previously, there was a custom of invoking departed spirits. A departed spirit is a soul. The departed spirit, which is the soul, is fed. They would say: Today, it is a special offering to the soul of our grandfather. Another day, they would say: It is an offering to the soul of so-and-so. Therefore, it is a soul that is invoked and fed. For instance, when someone loved his wife, her soul would be invoked. He would say: I promised to give her a diamond nose stud. Therefore, he would invite a brahmin priest to invoke her in order for it to be put on her. It is the soul that is called. The body does not come. This custom only exists in Bharat. It is the same as when you go to the subtle region. When someone dies, you offer bhog for that soul. That soul goes to the subtle region. These aspects are completely new. Until these things are understood properly, doubts will arise: “What are they doing? Just look at the customs and systems these Brahmins have!” At this time, all human beings are tamopradhan. Baba is the Purifier. He can never become tamopradhan. Human beings cannot be called the Purifier. “The Purifier” means the One who makes the whole world pure from impure. That can be none other than the one Father. The founders of religions come to establish their own religions. There is a genealogical tree of the Christian religion. Christ came first, and then expansion took place as others continued to come after him. He (Christ) cannot purify impure ones. Their population comes, numberwise. The Purifier is needed now, because everyone is buried in the graveyard. There is only the One who purifies everyone. You understand that, at this time, everyone has definitely reached their stage of total decay. The example of the banyan tree is given. It is a very big tree. Many groups of people go and sit beneath it. Its foundation has decayed, but the branches are still there. This too is a tree. The foundation of the inverted tree of the deity religion is up above and the roots have been completely cut off. All the rest are there. It’s only when the Seed is there that creation can take place again. Baba says: I come to carry out establishment once again; establishment through Brahma and destruction through Shankar. A kingdom was established for those who studied Raja Yoga, all the innumerable religions were destroyed in the Mahabharat War. You understand that you will now go to Baba and then go down into the new world. Then the tree will continue to grow. The deity religion that used to exist has now disappeared. Therefore, the Father says: I have come again to establish the original eternal deity religion. Bharat, that used to be the highest on high, has been eclipsed. By sitting on the pyre of lust, the whole world has become ugly. You now sit on the pyre of knowledge and become beautiful again. You have become ugly. Only the one Supreme Father, the Supreme Soul, makes you beautiful from ugly. You receive His shrimat. The soul of the Supreme Father, the Supreme Soul, is ever pure and beautiful. Alloy becomes mixed into souls (example of gold). You understand that this old world is now going to be destroyed. Everyone is going to die, and there will be no one left to tell you to say: Rama, Rama. This death is such that everyone will die. Now, how many will die? How much fertilizer will the earth receive? So, why would the earth not give first-class grain? In the golden age, all the vegetation will be fresh and green. Things that go rotten are called fertilizer. When rubbish is burned, it becomes fertilizer. It takes time to make fertilizer. It also takes time for this world to become new. When you go to the subtle region, you are shown many varieties of large fruit there. You are also given subiras (mango juice) to drink. You can imagine just how much fertilizer the earth, and especially Bharat, will receive. Very good things will emerge there. In the subtle region you are given the nectar of the golden age to drink and are also given visions of gardens etc. There, we will have a garden. Children came back after having had visions of how they drank the sweet nectar there; a prince would bring fruit from the garden. Now, there can be no garden in the subtle region. They must surely have gone to Paradise. Not everyone can be granted a vision. Only those who become instruments are granted visions. It is possible that if you stay in remembrance and remain Baba’s children and are completely surrendered, you may receive many visions later on. This bhatthi first had to be created. Many came into this bhatthi to become strong. It has been explained to you children that no one will understand anything simply by being given literature. A teacher is definitely needed to explain. A teacher can explain within a second that that One is your Father and that this one is Dada. That unlimited Father is the Creator of heaven. If you simply give people literature, they will glance at it and throw it away; they will not understand anything. You must definitely explain enough to show that the Father has come. It is your duty to beat the drums. There are Yadavas, Kauravas and Pandavas. The great Mahabharat War is standing ahead. There must have also been someone who taught Raja Yoga because the establishment of heaven must definitely have taken place. There will be the establishment of one religion and destruction of all other religions. You know that you are the ones who become Lakshmi from an ordinary woman and Narayan from an ordinary man. This is our aim and objective. It has been said that it didn’t take God long to change humans into deities. Only those who enter the sun dynasty are called deities. Those who go into the moon dynasty are called warriors. You first have to become a deity. You become a warrior if you fail. Therefore, Baba says: O sweetest, beloved, long-lost and now-found children. There are so many long-lost and now-found children. When someone’s child is found after having been lost for six or eight months, they meet one another with so much love! That father would have so much happiness. This Father also says: Beloved children, long-lost and now-found children, you have met Me again after 5000 years. Beloved children, you became separated, and you have now come again to meet Me in order to claim your unlimited inheritance. The deity world sovereignty is your Godfatherly birthright. Baba has come to give you an unlimited kingdom. This is Heavenly God, the Father. He says: I have brought a very big gift for you children. However, you have to become worthy enough for that by following shrimat. If you say “Mama and Baba” and forget or divorce Me, you cannot become a garland around My neck. Children are given so much love. A father places his children on his head. The unlimited Father has many children. Baba enables you to climb very high. Baba enables those who have fallen to the ground to climb up again. Therefore, how much happiness you should experience! You should follow shrimat. Follow the directions of the One. If you follow your own directions, you die. You will become an elevated human being, that is, a deity, if you follow shrimat. The warriors are two degrees less. Here, you have to become deities, not warriors, from human beings. The Father asks: How many marks will you pass with? Maintain the Father’s honour. The unlimited Father says: Become those of the sun dynasty. You know that 108 passed in the rosary of victory. You have to follow Mama and Baba. You make others into spinners of the discus of self-realization, similar to yourselves and bring them as gifts in front of Shiv Baba. Baba asks: How many have you made similar to yourself? This is an aspect of great pleasure. Only you understand these things. Someone new would definitely not understand. This is the college for becoming deities from human beings. Some become coloured very well in the seven days’ course, whereas others don’t become coloured at all. It is very difficult for dirty clothes to be coloured. You have to make a great deal of effort. The first thing that is explained to you children is that you should first ask everyone: Do you know the unlimited Father? They say: Yes, He is in me, He is omnipresent. Oh! if He is in you, then there is no question of asking! You call Him, “Father”, so how can the Father be in you and me? If He is the Father, you would surely receive an inheritance from Him. Firstly, explain about Alpha. The Father says: My long-lost and now-found children. Sannyasis and gurus cannot say this. You understand that you are definitely Shiv Baba’s long-lost and now-found children. You have come again after 5000 years to meet Him, in order to claim your inheritance of heaven. Do you know that you were the masters of heaven and that you will become those masters again? You definitely have to go to heaven. Then you will claim a high status according to your efforts. Achcha.To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children. Essence for Dharna: 1. Follow Mama and Baba and go into the sun dynasty.Do not follow your own directions. Claim a high deity status by following shrimat. 2. Maintain the faith that you will always remain Baba's. Have no doubt about anything. Blessing: May you be a beloved child of the Comforter of Hearts and with the miracle of the intellect, experience the corporeal one in the subtle one. Although some children have come later, they can experience the corporeal form through the subtle form. They say from experience that they have taken sustenance from the corporeal form and are receiving it even now. To experience the corporeal form in the subtle form is the practical form of the intellect’s love and of love. This is also evidence of the miracle of the intellect. Only such children are close to the Father, the Comforter of Hearts, and the beloved children of the Comforter of Hearts and they constantly have the song playing in their hearts, “Wah mera Baba. Wah!” Slogan: Success is merged in every deed and step of a renunciate soul. #english #bkmurlitoday #Murli #brahmakumari
- BK murli today in Hindi 20 June 2018 Aaj ki Murli
Brahma Kumaris murli today in Hindi - Aaj ki Murli - 20-06-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन“ मीठे बच्चे-अब पुण्य आत्मा बनने के लिए परम शिक्षक की शिक्षाओं को धारण करो, पाप कर्मों के खाते को योग द्वारा चुक्तू करो” प्रश्न :मोस्ट बिलवेड बाप में भी कई बच्चों को कभी-कभी संशय उठ जाता है-क्यों और कब? उत्तर: बच्चे जब किसी की बातों में आ जाते, संगदोष में आने से ही संशय उठता है। यहाँ से बाहर गये तो यहाँ की यहाँ रही। ऐसा भूल जाते जो अपनी खुश-खैराफत का समाचार भी नहीं देते। क्लास में भी नहीं जाते, मुरली भी नहीं पढ़ते इसलिए बाबा कहते-बच्चे, इस संगदोष से बहुत सावधान रहना। कभी भी किसी की बातों में नहीं आना। गीत: इस पाप की दुनिया से..... ओम् शान्ति।अभी परम शिक्षक यह पाठशाला चला रहे हैं। यह तो समझाया गया है वह परमपिता भी है तो परम शिक्षक भी है। तुम बाप के बनते हो। इस समय बाप जो तुम्हारी परवरिश करते हैं, वही शिक्षक बन तुम बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं। तुम जो इस पाप की दुनिया में रहे हुए हो फिर तुमको पुण्य आत्माओं की दुनिया में ले जाने की शिक्षा दे रहे हैं। यह है पाप आत्माओं की दुनिया। सबसे जास्ती पाप कराने वाली माया रावण है। सबसे बड़ा पाप है एक-दो को पतित बनाना। 21 जन्म के लिए आत्मा को पावन बनाने का पार्ट पतित-पावन बाप का है। जब ओ गॉड फादर कहते हैं तो आंख जरूर ऊपर करते हैं। फिर कह देते हैं परमात्मा सर्वव्यापी है। बाप समझाते हैं इस माया रावण ने सबको तुच्छ बुद्धि बना दिया है। सब परमात्मा को याद करते हैं क्योंकि जानते हैं यह दु:खधाम है। साधू लोग भी समझते हैं यह दु:खधाम है इसलिए साधना करते हैं शान्तिधाम में जाने की। भारतवासी भी चाहते हैं हम कृष्णपुरी में जायें। सभी से प्यारे ते प्यारा है श्रीकृष्ण। परन्तु भारतवासी समझते नहीं कि वह कब आया, क्या आकर किया? बाप कहते हैं यहाँ एक भी पुण्य आत्मा नहीं। भल दानपुण् य तो करते रहते हैं, इससे अल्प काल सुख मिलता है। ऐसे नहीं कि सदा सुखी, सदा शान्त बन जाते हैं। दु:खधाम में सदा शान्ति हो नहीं सकती। एक घर में भी शान्ति नहीं रहती है। कोई न कोई झगड़ा रहता ही है इसलिए परमपिता परमात्मा को पुकारते हैं-बाबा इस पाप की दुनिया से और जगह ले चल। कोई चाहते हैं निर्वाणधाम में जायें परन्तु जब उसका भी मालूम हो तब तो जा सके ना। निवास स्थान का पता हो तो वहाँ जा भी सकें। समझो पिकनिक करने जाते हैं, कहेंगे आज फलानी जगह पिकनिक करें। जगह का मालूम होगा तब तो जायेंगे। मनुष्य समझते हैं हम बैकुण्ठ जावें। परन्तु जानते नहीं-कैसे जायें? कोई मरता है तो कहते हैं लेफ्ट फार हेविनली अबोड, तो जरूर नर्क में है ना। कहते भी हैं पतित-पावन आकर हमको पावन बनाओ। स्वर्ग में तो हैं ही पावन। यहाँ मनुष्य गाते रहते हैं-पतित-पावन आओ क्योंकि यह पतित सृष्टि है। परन्तु समझते नहीं। अपना नशा रहता है। कितनी उन्हों की महिमा होती है। कोई बड़ा आदमी मरता है तो कितना उनका करते हैं! कितनी उन्हों की महिमा होती है! अभी तुम समझते हो हम बाप के साथ बैठे हैं। वह सबसे ऊंच ते ऊंच परमपिता परमात्मा है। फिर सेकेण्ड नम्बर में ब्रह्मा है। वह रूहानी पिता, यह जिस्मानी पिता। बापदादा दोनों इकट्ठे हैं। बाबा कहते हैं-यह दु:ख की दुनिया है ना। बाप आये है सुखधाम बनाने। इस समय टीचर के रूप में बैठे हैं। फिर ले जायेंगे साथ में। तो तुम बच्चों को अब लायक बना रहे हैं। सभी को ले तो जरूर जाऊंगा। तुम जानते हो हम आत्मायें निर्वाणधाम में रहती हैं। आत्मा जब शरीर से अलग शान्त है तो राजाई नहीं कर सकती। राजाई करनी है शरीर के साथ। पहले तो जरूर स्वीट होम जाना पड़े। तो जरूर स्वीट बाबा चाहिए। बाप समझाते हैं-हे भारतवासियों, मेरा जन्म भी भारत में ही होता है। मैं आया ही भारत में हूँ। तुमको यह भी पता नहीं है कि बाप पहले कब आये थे, आकर भारत को बेगर से प्रिन्स बनाया था? तुम मेरी जयन्ती मनाते हो। शिवरात्रि मनाते हो ना। फिर होती है कृष्ण जयन्ती। जब तक शिव जयन्ती न हो तब तक कृष्ण जयन्ती हो कैसे सकती? स्वर्ग की जयन्ती और नर्क का विनाश होना है। स्वर्ग की जयन्ती शिवबाबा ही करेंगे। कृष्ण थोड़ेही करेंगे। कृष्ण की तो तुम महिमा करते हो। शिव भगवान् की बायोग्राफी कहाँ? कोई नहीं जानते। अभी तुम जान गये हो-आजकल तो शिव जयन्ती का कोई मूल्य नहीं रहा है। शिव जयन्ती नाम भी उड़ा दिया है। त्रिमूर्ति के ऊपर भी शिव के बदले त्रिमूर्ति ब्रह्मा कह दिया है। बाप समझाते भी हैं और फिर साथ-साथ कहते हैं-बच्चे, यह अनादि बना-बनाया ड्रामा है। आधा-कल्प है भक्ति मार्ग, आधाकल्प है ज्ञान मार्ग। आधा-आधा है ना। अब वो लोग सतयुग-त्रेता को लाखों वर्ष कह देते हैं और कलियुग की आयु छोटी दिखाते हैं तो फिर आधा-आधा कैसे होगा? सतयुग को बहुत लम्बा कह देते हैं, कलियुग को 40 हजार वर्ष कह देते। आधा-आधा तो हुआ नहीं। फिर भक्ति मार्ग कब शुरू हुआ? रामराज्य और रावणराज्य आधा-आधा है। कल्प की आयु ही 5 हजार वर्ष है। 4 हिस्से का भी महत्व है। जगन्नाथपुरी में चावलों का हाण्डा बनाते हैं फिर उनके 4 भाग हो जाते हैं। स्वास्तिका में भी 4 भाग दिखाते हैं। उसमें गणेश निकालते हैं। यह सब है पूजा की सामग्री। बाप कहते हैं अभी तुम्हारे पापों का खाता चुक्तू हो पुण्य का खाता जमा हो रहा है। जितना तुम मुझे याद करेंगे उतना पाप भस्म होंगे, तब तुम पुण्य आत्मा बनेंगे। गंगा स्नान करने जाते हैं, पवित्र बनने के लिए फिर आकर अपवित्र बनते हैं। परन्तु यह भी और कोई समझा नहीं सकते। बाप फिर भी बाप है बाकी तो सब भाई-भाई हैं। आत्मा के रूप से सब भाई-भाई हैं। भाई को भाई से कोई भी प्रकार का वर्सा मिल नहीं सकता। वर्सा मिलता ही है बाप से। बाप एक है, इसमें कम्बाइन्ड है। वह हम आत्माओं का बाप और यह फिर है मनुष्यों का पिता। प्रजापिता है ना। अभी तुम जानते हो कि हम इस पाप की दुनिया से सुखधाम में जा रहे हैं। श्रीमत से हम श्रेष्ठ अर्थात् ब्राह्मण से देवता बनते हैं। वर्ण भी भारत के साथ ही लगते हैं और धर्मों के साथ वर्ण नहीं लगते हैं। ब्राह्मण वर्ण, फिर देवता वर्ण, फिर क्षत्रिय वर्ण.... यह आलराउन्ड हुआ ना। औरों को इन वर्णों में नहीं ला सकते। विराट स्वरूप में भी यह वर्ण दिखाते हैं। ब्राह्मण वर्ण ही ईश्वरीय वर्ण है, जिसमें तुम आकर बाप के बच्चे बनते हो। प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे तुम बी.के. हो। जैसे क्राइस्ट क्रिश्चियन का जिस्मानी बाप हुआ। रूहानी बाप सभी का एक ही है। वह निराकार बाप आकर साकार शरीर का लोन लेते हैं। कृष्ण की खड़ाऊ आदि रख पूजा करेंगे। शिवबाबा कहते हैं मेरे तो न चरण हैं, न खड़ाऊ पहनता हूँ। हम माताओं को अपने चरणों पर कैसे झुकाऊंगा! बाप जानते हैं बच्चे बहुत थके हुए हैं। बच्चों का थक आकर मिटाते हैं। इस थकावट से ही दूर कर देते हैं, सतयुग में थकावट की बात ही नहीं रहती। अभी तो माथा टेकते-टेकते टिप्पड़ घड़ी-घड़ी घिसाते टिप्पड़ ही खाली कर दी है। वेस्ट ऑफ टाइम, वेस्ट ऑफ मनी। बाप कहते हैं हमने तुम बच्चों को बहुत धनवान बनाया था। अब फिर बना रहा हूँ। यह एक-एक वरशन्स लाखों रूपयों की मिलकियत हैं। भारत कितना कंगाल बना है। इतना इनसालवेन्ट कभी कोई होता नहीं। प्रजा साहूकार है। गवर्मेन्ट लोन लेती रहती है। किस्म-किस्म की तरकीब निकालते हैं लोन लेने की। भारत की गवर्मेन्ट बिचारी सब भूल गई है। जो खुद मालिक थे वही पूज्य से पुजारी बन गये हैं। अब समझते हैं बरोबर हम सो देवी-देवता थे। विश्व के मालिक थे। हम सो इस समय ईश्वरीय सन्तान ब्राह्मण कुल भूषण हैं। फिर हम सो देवता वर्ण में आयेंगे। फिर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र वर्ण में आयेंगे। फिर ब्राह्मण बनेंगे। यह हम सो का अर्थ तुम समझते हो। वह फिर कहते हम आत्मा सो परमात्मा। बेड़ा ही गर्क कर दिया है। मनुष्यों को यह भी पता नहीं कि स्वर्ग कहाँ हैं? कहते हैं स्वर्गवासी हुआ अथवा ज्योति ज्योत समाया। आत्मा को भी मार्टल बना देते हैं। बुद्धू बुद्धि हैं ना। यह भी ड्रामा बना-बनाया है। यह लड़ाई शुरू हो जायेगी फिर बहुत त्राहि-त्राहि करना पड़ेगा। यह सीन भी ब्राह्मण बच्चे ही देखेंगे। सो भी जो पक्के सर्विसएबुल बच्चे होंगे। साक्षात्कार भी पहाड़ी से होता है। तुमने नाटक देखा होगा-कैसे विनाश होता है, आग लग रही है। मूसलधार बरसात पड़ रही है। अनाज नहीं मिलता। कहते हैं शंकर के आंख खोलने से विनाश हो जाता है। यह तो गायन है। इसमें आंख खोलने की तो कोई बात ही नहीं। यह तो ड्रामा की भावी है। बाप आकर नई दुनिया बनाते हैं। अब दुनिया बदल रही है। तुम नई दुनिया के लिए पुरूषार्थ कर रहे हो। फिर भी माया कितनी दुस्तर है। ऐसे बाप के बनकर फिर छोड़ देते हैं। जाकर बदनामी करते हैं। बड़े अच्छे-अच्छे बच्चे थे। आज हैं नहीं। बिलवेड बाप या बिलवेड पति होता है तो हफ्ते-हफ्ते पत्र जरूर लिखते हैं। बच्चा बाप को पत्र लिखते हैं खुश-खैराफत का। यहाँ से जाते हैं तो माया एकदम नाक से पकड़ लेती है। धनवान है तो माया बड़ा जोर से थप्पड़ मारती है। गरीब को इतना नहीं। बाबा नाम नहीं लेते हैं। बापदादा पास आये, कितनी सेवा की। कोई ने कुछ बोला, संशय आया, खलास। न चिठ्ठी, न क्लास में जाना, खत्म हो जाते हैं। जैसे गर्भ में बच्चे को सजा मिलती है। कहते हैं फिर हम जेल बर्ड नहीं बनेंगे। हमको बाहर निकालो। फिर बाहर आने से संगदोष में आ जाते हैं। वहाँ की वहाँ रही। वैसे ही यहाँ से घर में गये खलास। यहाँ की यहाँ रही। यहाँ तो बड़ा मजा आता है। यहाँ तो कोई मित्र सम्बन्धी आदि है नहीं। शूद्र कुल में गये और माया घसीट लेती है। माया तुम बड़ी जबरदस्त हो जो तुम मेरे को याद करना भुला देती हो। ज्ञान भी भूल जाते हैं। अभी वही बाप टीचर बनकर पढ़ा रहे हैं। मनुष्य भगवान् को ही धर्मराज समझते हैं। कहते हैं भगवान् ही सुख-दु:ख देते हैं। दु:ख माना सजा। बाप कहते हैं मैं दु:ख नहीं देता हूँ। एक तो रावण तुमको दु:ख देते हैं दूसरा फिर गर्भ जेल में धर्मराज तुमको सजा देते हैं। जो पाप किये हैं उनका साक्षात्कार करा देते हैं। सतयुग में तो गर्भ महल होता है अथवा क्षीरसागर कहो। दिखाते हैं क्षीरसागर में कृष्ण अंगूठा चूसते मजे में पीपल के पत्ते पर बैठा है। वह है गर्भ सागर। द्वापर-कलियुग में गर्भ जेल रहता है। अन्दर पापों की बहुत सजा मिलती है। माया का राज्य है ना। 63 जन्म गर्भ जेल में जाना पड़ता है फिर वहाँ गर्भ महल में 21 जन्म बड़े आराम से रहते हैं। कोई पाप होते नहीं जो त्राहि-त्राहि करनी पड़े। तो यह तुमको बाप-टीचर-सतगुरू समझा रहे हैं। तुम समझते हो हम भी बुद्धू थे। अभी समझदार बन रहे हैं। जब मनुष्य पतित बन पड़ते हैं तब बाप एक ही बार आकर पावन बनाते हैं। अभी तुम बच्चे स्वदर्शन चक्रधारी बने हो। वह चक्र का अर्थ थोड़ेही जानते हैं। समझते हैं पाण्डवों-कौरवों की लड़ाई चली तो कृष्ण ने यह चक्र फिराया विनाश के लिए..... आदि-आदि बहुत ही दन्त कथायें लिख दी हैं। ऐसे है नहीं। हमको भी सृष्टि चक्र के आदि-मध्य-अन्त का नॉलेज मिला है। स्वदर्शन चक्रधारी बनने से फिर चक्रवर्ती महाराजामहारानी बनते हैं। सारे विश्व के मालिक बनते हैं। प्रजा भी मालिक ठहरी ना। अभी प्रजा भी कहेगी हम भारत के मालिक हैं। यथा राजा-रानी तथा प्रजा..... परन्तु राजा और प्रजा में फर्क तो है ना। वह अभी ही सारा पढ़ाई से पता पड़ता है। अच्छा!पतित से पावन बनाने वाले मात-पिता बापदादा का, पतित से पावन बनने वाले बच्चों को यादप्यार और गुडमर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों प्रति नमस्ते। धारणा के लिए मुख्य सार: 1) स्वीट होम में जाने के लिए बहुत-बहुत स्वीट बनना है। कभी भी संगदोष में आकर बाप को भूलना नहीं है। संशय नहीं उठाना है। 2) अन्तिम विनाश की सीन देखने के लिए पक्का ब्राह्मण, सर्विसएबुल बनना है। बाप का बनकर बाप की बदनामी नहीं करानी है। वरदानः एक ही समय मन-वाणी और कर्म द्वारा साथ-साथ सेवा करने वाले सफलता सम्पन्न भव l जब भी किसी स्थान की सेवा शुरू करते हो तो एक ही समय पर सर्व प्रकार की सेवा करो। मन्सा में शुभ भवना, वाणी में बाप से सम्बन्ध जुड़वाने की शुभ कामना के श्रेष्ठ बोल और सम्बन्ध-सम्पर्क में आने से स्नेह और शान्ति के स्वरूप से आकर्षित करो। ऐसे सर्व प्रकार की सेवा साथ-साथ करने से सफलता सम्पन्न बनेंगे। सेवा के हर कदम में सफलता समाई हुई है - इसी निश्चय के आधार पर सेवा करते चलो। स्लोगनः शुद्ध संकल्पों को अपने जीवन का अमूल्य खजाना बना लो तो वही संकल्प उठेंगे जिसमें अपना और दूसरों का कल्याण समाया है। #bkmurlitoday #Hindi #brahmakumaris
- 5 June 2018 BK murli today in Hindi - Aaj ki Murli
Brahma Kumaris murli today in Hindi - Aaj ki Murli - BapDada - Madhuban - 05-06-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन"मीठे बच्चे - तुम्हारा है सतोप्रधान सन्यास, तुम देह सहित इस सारी पुरानी दुनिया को बुद्धि से भूलते हो"प्रश्नः-तुम ब्राह्मण बच्चों पर कौन सी जवाबदारी बहुत बड़ी है?उत्तर:-तुम्हारे पर जवाबदारी है पावन बनकर सारे विश्व को पावन बनाने की। इसके लिए तुम्हें निरन्तर शिवबाबा को याद करते रहना है। याद ही योग अग्नि है जिससे आत्मा पावन बनती है। विकर्म विनाश हो जाते हैं।गीत:-दु:खियों पर रहम करो... ओम् शान्ति।बच्चों ने गीत सुना कि हम बच्चे हैं। तुम्हारा जरूर वह बाप है। अब बाप को बच्चे कभी भी सर्वव्यापी नहीं कहते। लौकिक बाप के बच्चे कभी ऐसे नहीं कहेंगे कि हमारा बाप सर्वव्यापी है। यह बेहद का बाप बैठ समझाते हैं तुम सब बच्चे हो, तुम्हारा बाप है, जिसको परमपिता कहते हैं। परमात्मा को सुप्रीम सोल भी कहते हैं। परम माना सुप्रीम, आत्मा माना सोल। तो जरूर सब बच्चे हैं और एक बाप है। सब भक्त एक भगवान को याद करते हैं जिसको याद किया जाता है उनका जरूर नाम, रूप, देश, काल होता है। उनको बेअन्त नहीं कहा जा सकता। मनुष्य ईश्वर बाप को बेअन्त कहते आये हैं, उनका कोई अन्त पा नहीं सकते हैं और फिर कहते हैं सर्वव्यापी है। यह तो बड़ा अनर्थ हो गया। पत्थर-ठिक्कर सबमें ईश्वर है उनको फिर बेअन्त कहते हैं। बच्चे बाप को भूल गये हैं इसलिए सारी मनुष्य सृष्टि नास्तिक पतित कही जाती है। हर एक नर-नारी पतित हैं तब तो पतित से पावन बनाने वाले को याद करते हैं। इस दुनिया में कोई को भी महान् आत्मा नहीं कहा जा सकता। पवित्र आत्मा पतित दुनिया में हो नहीं सकती। बापू गांधी जी भी कहते थे पतित-पावन सीताराम - यह मनुष्य के लिए कहते, पानी की गंगा के लिए तो नहीं कहा। यह है झूठ। झूठी माया, झूठी काया, है ही झूठ खण्ड। सचखण्ड था जबकि नई दुनिया में नया भारत था। अब वही भारत पुराना हो गया है। भारत जब नया था तो उनको स्वर्ग कहा जाता है, जिसको 5 हजार वर्ष हुए। त्रेता में दो कलायें कम हुई। इस समय तो कलियुग है, इनको कहा जाता है पुरानी दुनिया। पुरानी दुनिया में पुराना भारत। वर्ल्ड नई भी होती है तो पुरानी भी होती है। अब है पुरानी दुनिया, सब मनुष्य नास्तिक हैं, इसलिए दु:खधाम कहा जाता है। फिर इस दु:खधाम को सुखधाम तो एक ही बाप बना सकते हैं। भारत जो पावन था पतित बन गया है, जब प्युरिटी थी तो पीस प्रासपर्टी थी। भारत की आयु एवरेज बड़ी थी। अभी तो बहुत छोटी है। भारत रोगी कब से बना है - दुनिया नहीं जानती। ऐसे नहीं कहेंगे कि परम्परा से रोगी है। भक्ति शुरू ही द्वापर से होती है। कलियुग का जब अन्त होता है तब बाप आकर ज्ञान देते हैं। ज्ञान है ही ज्ञान सागर के पास। ज्ञान का सागर नॉलेजफुल - यह उस बाप की ही महिमा है। मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है। सर्वव्यापी कहने से बाप-बच्चे का लव नहीं रहता। यह है आरफन दुनिया। सब आपस में लड़ते रहते हैं इसलिए इसको रौरव नर्क कहा जाता है। भारत स्वर्ग था, अब नर्क है। यह किसको भी पता नहीं पड़ता है कि हम नर्कवासी हैं तो जरूर नर्क से ट्रांसफर होंगे। परन्तु ऐसे नहीं कि नर्कवासी पुनर्जन्म फिर स्वर्ग में ले सकते हैं। वह पुनर्जन्म सब नर्क में ही लेते हैं। नर्क को ही पतित दुनिया कहा जाता है। निर्वाणधाम आत्माओं के रहने का स्थान है जिसको निराकारी दुनिया कहा जाता है। आत्मा स्टार इमार्टल है। शरीर मार्टल है। आत्मा को एक शरीर छोड़ दूसरा लेना पड़ता है। 84 जन्मों का भी गायन है। 84 लाख जन्म कहना भी गपोड़ा है। बाप समझाते हैं जो भी आत्मा पार्ट बजाने आती है, आकर आरगन्स में प्रवेश करती है। परन्तु सबके 84 जन्म भी नहीं हो सकते। सतयुग में जो देवी-देवता होंगे उन्हों के ही 84 जन्म होंगे। बाप कहते हैं आगे भी कहा था तुम अपने जन्मों को नहीं जानते हो, मैं बतलाता हूँ। तुम हो ब्रह्माकुमार कुमारियां। अच्छा, ब्रह्मा का बाप कौन है? शिव। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर है शिवबाबा के बच्चे। उन्हों को भी अपना सूक्ष्म शरीर है। परमपिता परमात्मा को अपना शरीर नहीं है। बाप कहते हैं मेरा नाम ही शिव है। भल कोई रूद्र भी कहते, कोई सोमनाथ कहते हैं। हूँ तो मैं निराकार। बरोबर भारत में शिव के मन्दिर भी हैं। ज्ञान का सागर परमपिता परमात्मा को ही कहा जाता है, कृष्ण को नहीं कहेंगे। वह तो सतयुग का प्रिन्स है। उनमें यह आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान नहीं है। सतयुगी देवताओं में भी यह ज्ञान नहीं है। तुम जानते हो अभी हम हीरे तुल्य बन रहे हैं। परमपिता परमात्मा के सिवाए कोई राजयोग सिखला न सके। कृष्ण को परमात्मा नहीं कह सकते। परमात्मा सिर्फ एक निराकार को ही कहा जाता है। उस बाप को ही सब भूले हुए हैं।इस समय सब पतित तमोप्रधान हैं। बाप कहते हैं यह सारा वैराइटी मनुष्य सृष्टि का झाड़ है। तमोप्रधान रोगी दु:खी हैं। भारत कितना ऊंच था, अभी तो कंगाल है। शास्त्रों में तो कल्प की आयु ही लाखों वर्ष लिख दी है। समझते हैं कलियुग को अभी 40 हजार वर्ष चलना है। बाप समझाते हैं यह है घोर अन्धियारा। अब ज्ञान सूर्य प्रगटा अज्ञान अन्धेर विनाश। बाप है ज्ञान सूर्य। वह आकर अज्ञान घोर अन्धियारे को मिटाते हैं। अभी है ब्रह्मा की रात। सतयुग-त्रेता को ब्रह्मा का दिन कहा जाता है। तो तुम हो ब्रह्माकुमार कुमारियां, ब्रह्मा के बच्चे। ब्रह्मा तो विश्व अथवा स्वर्ग का रचयिता नहीं है। निराकार हेविनली गॉड फादर की ही महिमा है। वह बाप ही आकर राजयोग सिखलाते हैं। बाप कहते हैं - हे बच्चे, आत्माओं से बात करते हैं। आत्मा ही सब कुछ सुनती है, धारण करती है और संस्कार ले जाती है। जैसे बाबा ने समझाया है लड़ाई के मैदान में मरते हैं तो संस्कारों अनुसार जन्म ले फिर लड़ाई मे चले जायेंगे। इस समय सबकी आत्मायें तमोप्रधान हैं। सब एक-दो को दु:ख देते रहते हैं। सबसे बड़ा दु:ख कौन देते हैं? जो तुम्हें परमात्मा से बेमुख करते हैं इसलिए शिवबाबा कहते हैं - बच्चे, तुम उन सबको छोड़ो। गॉड इज वन कहा जाता है।तुम सब ब्राइड्स हो, मैं हूँ तुम्हारा ब्राइडग्रूम। हे सजनियां, तुम बिल्कुल लायक नहीं हो स्वर्ग मे चलने के लिए। माया ने तुमको बिल्कुल ना लायक बना दिया है। यह है रावण राज्य। सतयुग में है राम राज्य। राम शिव को कहा जाता है। अभी तुम हो ब्राह्मण, परमपिता परमात्मा जो स्वर्ग की स्थापना करते है उनसे तुम वर्सा ले रहे हो। भारत-वासियों को स्वर्ग का वर्सा मिल रहा है। कलष माताओं पर रखा है। माता गुरू बिगर किसका कल्याण नहीं होता। जिसके लिए गाते हैं त्वमेव माताश्च पिता.. उनको फिर सर्वव्यापी कहना कितनी बड़ी भूल है! मात-पिता को फिर बेअन्त कह देते हैं। गाते भी हैं तुम मात-पिता हम बालक तेरे, तुम्हारी कृपा से सुख घनेरे। फिर बाप पर दोष कैसे रखते हो। बाप तो आकर पतित से पावन बनाते हैं। पतित रावण बनाते हैं। अभी रावण राज्य खत्म हो रामराज्य फिर शुरू हो जायेगा। इस चक्र को अच्छी रीति समझना है। बेहद की हिस्ट्री-जॉग्राफी बेहद का बाप ही सुनायेंगे। यह है रुद्र ज्ञान यज्ञ। कृष्ण का यज्ञ नहीं है। वही गीता का राजयोग है परन्तु कृष्ण कोई ज्ञान नहीं देते हैं। यह है रुद्र शिव भगवानुवाच। रुद्र ज्ञान यज्ञ से ही विनाश ज्वाला प्रगट हुई है। अब तुम बच्चे आये हो मात-पिता से स्वर्ग का वर्सा लेने। यह कोई अन्धश्रधा नहीं है। युनिवर्सिटी वा कॉलेज में कोई अन्धश्रधा होती नहीं। यहाँ पर अन्धश्रधा की बात नहीं। तुम बाप से बेहद का वर्सा लेने मनुष्य से देवता बनने आये हो। यह गॉड फादरली युनिवर्सिटी है। बाप समझाते हैं यह भारत दैवी राजस्थान था। हीरे जवाहरों के महल बनते थे। भक्ति मार्ग में भी सोमनाथ का मन्दिर कितना बड़ा बनाया है। उनसे पहले क्या होगा। अभी तो भारत कंगाल है। फिर सिरताज बनाना बाप का ही काम है। अभी तुम बच्चे जानते हो हम मात-पिता के सम्मुख बैठे हैं और 21 जन्मों का सुख पा रहे हैं। बाप कहते हैं - हे आत्माओं, अब तुम मुझे याद करो मैं तुम्हारा गाइड और लिबरेटर हूँ। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी कैसे रिपीट होती है - यह तो बच्चों को समझाया जाता है। इसमें अन्धश्रधा की तो बात ही नहीं। तुम्हारा है सतोप्रधान बेहद का सन्यास। तुम पुरानी दुनिया को बुद्धि से छोड़ते हो इसलिए बाप कहते हैं सर्व धर्मानि.... देह सहित देह के जो भी संबंध हैं सबको भूल अपने को अशरीरी आत्मा समझो। बाप कहते हैं इस देह का भान छोड़ो। मुझ बाप को याद करने से ही तुम्हारे पाप भस्म होंगे। निरन्तर मुझे याद करो और कोई उपाय नहीं। अन्त तक याद करना है। माया जीते जगत जीत बनना है। माया पर जीत एक शिवबाबा ही पहना सकते हैं।अच्छा! अब बाप शिव शक्तियों द्वारा भारत पर अविनाशी बृहस्पति की दशा लाते हैं। बाप कहते हैं - मैं इस तन का लोन लेकर इनका नाम ब्रह्मा रखता हूँ। तुम ब्रह्माकुमार कुमारियां वर्सा लेते हो शिवबाबा से। याद भी शिवबाबा को ही करना है। वह कहते हैं मेरा नाम एक ही शिव है। तुम भी आत्मा हो परन्तु तुम शरीर लेते और छोड़ते हो इसलिए जन्म बाई जन्म तुम्हारे नाम बदलते हैं। 84 जन्म लेंगे तो 84 नाम पड़ेंगे। सबके तो 84 जन्म नहीं होंगे। कोई के 80, कोई के 60, कोई के 5-6 जन्म भी हो सकते हैं। मेरा नाम एक ही है शिव। शिवबाबा को याद करते रहो तो विकर्म विनाश होंगे। योग अग्नि बिगर कोई पावन बन नहीं सकते। तुमने प्रतिज्ञा की है - बाबा, हम पवित्र बन भारत को पावन बनाए फिर राज्य करेंगे। शिवबाबा को याद नहीं करते तो गोया अपने को पतित बनाते हैं इसलिए फिर धर्मराज की बहुत कड़ी सजा खानी पड़ेगी। तुम्हारे पर बड़ी रेसपान्सिबिलिटी है। बाप को याद करते रहना, यह है रूहानी यात्रा। अच्छा!मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते। धारणा के लिए मुख्य सार:- 1) निरन्तर एक बाप की याद से मायाजीत जगतजीत बनना है। पवित्र बनकर भारत को पवित्र बनाना है। 2) बुद्धि से बेहद पुरानी दुनिया का सन्यास करना है। इस देह-भान को भूलने का अभ्यास करना है। देही-अभिमानी रहना है। वरदान:- कलियुगी वायुमण्डल में रहते हुए उसके वायब्रेशन से सेफ रहने वाले स्वराज्य अधिकारी भव l स्वराज्य अधिकारी उसे कहा जाता जिसे कोई भी कर्मेन्द्रिय अपनी तरफ आकर्षित न करे, सदा एक बाप की तरफ आकर्षित रहे। किसी भी व्यक्ति व वस्तु की तरफ आकर्षण न जाए। ऐसे राज्य अधिकारी ही तपस्वी हैं, वही हंस, बगुलों के कलियुगी वायुमण्डल में रहते हुए सदा सेफ रहते हैं। जरा भी दुनिया के वायब्रेशन, उन्हें आकर्षित नहीं करते। सब कम्पलेन समाप्त हो जाती हैं। स्लोगन:- बुरे को अच्छे में बदल देना ही ऊंच ब्राह्मणों की श्रेष्ठ शक्ति है। मातेश्वरी जी के मधुर महावाक्य – 'ओम् शब्द का यथार्थ अर्थ क्या है? "जब हम ओम् शान्ति शब्द कहते हैं तो पहले पहले ओम् शब्द के अर्थ को पूर्ण रीति से समझना है। अगर कोई से पूछा जाए ओम् का अर्थ क्या है? तो वो लोग ओम् का अर्थ बहुत ही लम्बा चौड़ा सुनाते हैं। ओम् का अर्थ ओंकार बड़े चौड़े आवाज़ से सुनाते हैं, इस ओम पर फिर लम्बा चौड़ा शास्त्र बना देते हैं परन्तु वास्तव में ओम् का अर्थ कोई लम्बा चौड़ा नहीं है। अपने को तो स्वयं परमात्मा ओम् का अर्थ बहुत ही सरल और सहज अर्थ से समझाते हैं। वो भी अर्थ परमात्मा से मिलने के लिये ही समझाते हैं। परमात्मा साफ कहते हैं बच्चे ओम् का अर्थ है मैं आत्मा हूँ, मेरा असली धर्म शान्त स्वरूप है। अब इस ओम् के अर्थ में उपस्थित रहना है, तो ओम् का अर्थ मैं आत्मा परमात्मा की संतान हूँ। मुख्य बात यह हुई कि ओम् के अर्थ में सिर्फ टिकना है बाकी मुख से बैठ ओम् का उच्चारण नहीं करो, यह निश्चय बुद्धि में रखकर चलना है। ओम् का जो अर्थ है उस स्वरूप में स्थित रहना है, बाकी वो लोग भल ओम् का अर्थ लम्बा सुनाते हैं मगर उसके स्वरूप में स्थित नहीं रहते परन्तु हम तो ओम् का स्वरूप जानते हैं, तब ही उस स्वरूप में स्थित होते हैं। हम यह भी जानते हैं कि परमात्मा बीजरूप है और उस बीजरूप परमात्मा ने इस सारे झाड़ को कैसे रचा हुआ है, उसकी सारी नॉलेज हमें अभी मिल रही है। अच्छा। ओम् शान्ति। #bkmurlitoday #Hindi #brahmakumaris
- 27 May 2018 BK murli today in Hindi - Aaj ki Murli
Brahma kumaris murli today in Hindi - Aaj ki Murli - BapDada - madhuban -26-05-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन" मीठे बच्चे - आधाकल्प से माया ने तुम्हें श्रापित किया है, अब बाप तुम्हारे सब श्राप मिटाकर वर्सा देने आये हैं, तुम श्रीमत पर चलो तो वर्से के लायक बन जायेंगे।" प्रश्नः- देही-अभिमानी बनने का यथार्थ रहस्य तुम बच्चों ने क्या समझा है? उत्तर:- पुरानी दुनिया से मरकर बाप का बनना अर्थात् मरजीवा बनना ही देही-अभिमानी बनना है। इस पुरानी जुत्ती को भूल बाप समान अशरीरी बन बाप को याद करो - यही है देही-अभिमानी बनने का यथार्थ रहस्य। गीत: ओम् नमो शिवाए.... ओम् शान्ति।बच्चों ने गीत सुना। एक तरफ हैं भक्त घोर अन्धियारे में, दूसरी तरफ हैं मात-पिता के बच्चे। जिनकी महिमा सुनी और तुम तो अब सम्मुख बैठे हुए हो। कहते भी हैं शिवाए नम:। फिर फट से कह देते हैं तुम मात-पिता... सबका मात-पिता भी ठहरा, सबका स्वामी भी ठहरा। समझाया गया है जो भी मनुष्य मात्र हैं - नर अथवा नारी, सब हैं भक्त, ब्राइड्स और वह एक है ब्राइडग्रूम, स्वामी, मात-पिता। बरोबर तुम बच्चों का बाप भी है, सजनियों का साजन भी है। यह बातें तुम बच्चे ही जानते हो और सब अन्धियारे में हैं। तुम अभी सोझरे में हो। तुम जानते हो हम बाप के सम्मुख बैठे हैं। निराकार भगवान सृष्टि कैसे रचे? जरूर मात-पिता चाहिए इसलिए बाप कहते हैं मैं इस द्वारा बच्चों को नया जन्म देता हूँ। तुम भी कहते हो हम इस पुरानी दुनिया से मरकर बाप के बने हैं अर्थात् देही-अभिमानी बने हैं। बाप तो सदैव देही-अभिमानी ही है। वह आकर इस समय देही-अभिमानी बनाने का रहस्य समझाते हैं। तुम जिनकी महिमा करते थे, त्वमेव माताश्च पिता... उनके सम्मुख बैठे हो। भल तुम अपने गाँव में हो तो भी सम्मुख हो।बाप आये हैं बच्चों की सर्विस में। पतित-पावन बाप जानते हैं कि मुझे ही पतितों को पावन बनाना पड़ता है। याद तो उनको ही करते हैं ना - पतित-पावन आओ। अभी तो तुम संगमयुग पर हो। जानते हो बरोबर हम पतित थे। पतितों को पावन करने वाला एक बाप है जिसको कहते हैं शिवाए नम:। बच्चे बाप को पुकारते हैं। बच्चे सबको प्यारे लगते हैं। बच्चों की सेवा में बाप उपस्थित रहते हैं। बच्चे पैदा होते हैं तो बाप उन्हों की सर्विस में उपस्थित होते हैं। अभी तुम जानते हो उन द्वारा पावन बन रहे हैं। बरोबर वह बिलवेड बाप है ना, जिसको आधाकल्प हमने पुकारा है। सतयुग-त्रेता में हमने बाप का वर्सा पाया था। फिर वह वर्सा गुम हो गया। माया रावण का श्राप लग गया। हम बिल्कुल ही दु:खी बन पड़े थे। दुनिया में सब दु:खी ही दु:खी हैं। दु:ख के पहाड़ गिरते हैं। तब ही बाप कहते हैं - हम आते हैं। सब पाप आत्मा बन पड़े हैं। पाप करने वाले दु:खी बन पड़ते हैं। बाप आकर के पुण्य आत्मा बनाते हैं, वर्सा देते हैं। तुम जानते हो बरोबर हम फिर से बेहद के बाप से 21 जन्मों का वर्सा लेते हैं। माया ने श्रापित कर दिया है। बाप वह श्राप मिटाते हैं। बाप कहते हैं मुझे याद करो तो तुम सदा शान्त बन जायेंगे। यहाँ तो शान्ति हो न सके। दु:खधाम है ना। हम तुमको शान्तिधाम में ले चलते हैं। वहाँ सुख, शान्ति, धन आदि सब है। बेहद के बाप से तुम 21 जन्मों के लिये झोली भरने आये हो। हरेक को अपने पुरुषार्थ से वर्सा पाना है, जबकि भगवान के बच्चे बने हो। वह है स्वर्ग का रचयिता। तो जरूर स्वर्ग का वर्सा देता होगा। हम उनके बच्चे हैं तो जरूर वर्सा मिलना चाहिए। बच्चे ही वर्से के अधिकारी हैं। बाप कहते हैं 5 हजार वर्ष पहले तुमको वर्सा दिया था फिर गँवा दिया। अभी संगमयुग है, फिर तुमको वर्सा मिल रहा है। यह तुम जानते हो कि कल्प पहले स्वदर्शन चक्रधारी ब्राह्मण कुल भूषण बने थे। वही धीरे-धीरे आते रहेंगे। दिन-प्रतिदिन ब्राह्मण कुल भूषण बनते रहेंगे। बिरादरी बढ़ती रहेगी। ब्रह्मा मुख वंशावली आप बनते हो। बनाते हैं शिवबाबा। तुम इस समय ईश्वरीय औलाद हो। तुमको सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण, अहिंसा परमोधर्म का बनाते हैं। देवतायें कब हिंसा नहीं करते। तुम जानते हो हम सो देवता थे। अब फिर से हम बनते हैं। चक्र लगाया, देवता कुल से क्षत्रिय कुल अथवा वर्ण में आये। क्षत्रिय कुल से वैश्य कुल अथवा वर्ण में आये। हम 84 जन्मों का चक्र पूरा कर आये हैं। अब फिर से बाप आये हैं वर्सा देने। श्राप मिटाकर पतित से पावन बनाते हैं। यहाँ सब मनुष्य मात्र श्रापित हुए पड़े हैं। बाप आकर श्राप मिटाकर वर्सा देते हैं। यह है संगमयुग। अभी सतयुग तुमसे दूर नहीं है। स्वर्ग इतना नजदीक है, जितना यह आत्मा का शरीर नजदीक है। बहुत नजदीक है। मनुष्य स्वर्ग को बहुत दूर समझते हैं। परन्तु तुम बच्चे अब बहुत नजदीक आये हो। पाँच हजार वर्ष पहले की बात है जबकि स्वर्ग था। आधा कल्प स्वर्ग था फिर आधा कल्प नर्क चला है। अभी स्वर्ग सामने खड़ा है।बाप कहते हैं सेकेण्ड में स्वर्ग का राज्य लो। बरोबर तुम जानते हो हम बाप के बनते हैं तो स्वर्ग के मालिक बनते हैं। जैसे बच्चा समझता है हम बाप से वर्सा लेते हैं। बाप समझेंगे वारिस पैदा हुआ। भल छोटा बच्चा है, मुख से कुछ बोल नहीं सकता है परन्तु बाप जानते हैं यह वारिस है। यह है बेहद का बाप। आत्मा समझती है बरोबर हम बाप के बने और वारिस हो गये। बाप भी कहते हैं तुम स्वर्ग के वारिस तो जरूर बन गये। परन्तु वर्से में भी बहुत दर्जे हैं। कोई सूर्यवंशी, कोई चन्द्रवंशी, कोई प्रजा में आयेंगे। मर्तबे तो अलग-अलग हैं। बच्चे कहेंगे हम बाप की प्रापर्टी के मालिक बनते हैं। तुम बच्चे जानते हो हम बेहद बाप के बच्चे हैं। हम सारे विश्व के मालिक बनते हैं। सिर्फ भारत ही नहीं, सारे विश्व के। भल भारत में राज्य करते हो परन्तु विश्व के मालिक हो। वहाँ कोई दूसरा राजा राज्य करने वाला नहीं रहता। तो तुमको कितना नशा रहना चाहिए! बेहद का बाप और बेहद के बच्चे। अब तुम कितने बच्चे हो! तुम कहेंगे हम स्वर्ग के मालिक बन रहे हैं। बाप जैसा मीठा कोई नहीं। बाप निष्काम सेवा करते हैं। खुद मालिक नहीं बनते, बच्चों को बनाते हैं। मनुष्य कहते हैं इस दादा ने खुद तो बहुत सुख देखे, बुढ़ापे में आकर सन्यास किया तो क्या हुआ। शिवबाबा के लिये तो ऐसा नहीं कहेंगे ना। वह तो कहते हैं मैं तो स्वर्ग का सुख नहीं लेता हूँ। मैं तुमको स्वर्ग का मालिक बनाकर तुमको स्वर्ग की राजधानी देता हूँ। वह राजे लोग खुद राज्य करके फिर राज्य-भाग्य देते हैं। यह तो कहते हैं - लाडले बच्चे, मैं परमधाम से आया हूँ तुमको राज्य-भाग्य देने के लिये। मैं राज्य नहीं करता हूँ। मुझे इस पतित दुनिया, पतित शरीर में आना पड़ता है तुमको पावन बनाने। इसमें भी कितने विघ्न पड़ते हैं! कृष्ण ने नहीं भगाया था। शिवबाबा के पास तुम भागकर आते हो। कहेंगे - हम बाबा के पास जाते हैं पूरा वर्सा लेने। सम्मुख जाकर गोद लेते हैं। तुम कहते हो हमने अब ईश्वरीय गोद ली है। ईश्वर से वर्सा पाना है। बाप आते हैं पतित दुनिया में, इस रावण रूपी दुश्मन से छुड़ाने। यह 5 विकार रूपी रावण ही मनुष्य का बड़े ते बड़ा दुश्मन है। यहाँ तुमको इस दुश्मन से छूटना है। पतित-पावन एक ही बाप है, जिसको शिवाए नम: कहते हैं। सबका साजन अभी तुम सजनियों को गुल-गुल बनाकर ले जाते हैं। अभी तुम्हारी आत्मा और शरीर - दोनों ही पतित हैं। मैं तुम्हारी आत्मा को पवित्र बनाता हूँ। तो शरीर भी पवित्र मिलेगा। फिर तुम सतयुग के महाराजा-महारानी बनेंगे। साजन आकर लायक बनाते हैं। जानते हो कि माया रावण ने नालायक बनाया था। अभी शिवबाबा ब्रह्मा तन से लायक बनाते हैं। अगर श्रीमत पर चलते रहेंगे तो। श्रीमत है भगवान की। मात-पिता भी उनको कहते हैं। कृष्ण को नहीं कहेंगे। अभी तुम बच्चे जानते हो जिसकी वह महिमा करते हैं, उनसे हम पढ़ रहे हैं। ब्राह्मण कुल बनता है जरूर। फिर दैवी कुल में जाना है। जरूर ब्रह्मा मुख से पहले-पहले यह ब्राह्मण चोटी निकलते हैं। तुम ब्राह्मण हो रूहानी पण्डे, रूहानी सेवा करने वाले। बाप कहते हैं मैं तुम्हारा पण्डा बन आया हूँ सच्चे-सच्चे तीर्थ पर ले जाने। तुमको बहुत सहज बात बतलाता हूँ। सिर्फ बाप को याद करना है और अपने को आत्मा समझना है। तुम्हें कोई भी ईविल बातें नहीं सुननी है, इविल बातें बहुत नुकसानकारक हैं। इस समय सारी दुनिया में पाँच भूतों की प्रवेशता है। तो इविल ही सुनायेंगे। बेहद के बाप की कितनी भारी महिमा है फिर कह देते सर्वव्यापी है। तुम समझा सकते हो - गाते हो पतित-पावन आओ। फिर सर्वव्यापी कहते हो तो सब पावन होने चाहिए। सर्वव्यापी के ज्ञान ने ही भारत को नास्तिक, कौड़ी तुल्य बना दिया है। बाप तो कहते हैं मैं तुम बच्चों को कल्प-कल्प आकर पतित से पावन बनाकर स्वर्ग का मालिक बनाता हूँ। मैं तुम्हारी सेवा में उपस्थित हूँ। भल कितना भी सहन करना पड़ता है तो भी सेवा में उपस्थित हूँ। मैं तो जानता हूँ - बच्चे बहुत हैं, कोई श्रीमत पर चलते हैं, कोई नहीं चलते हैं, कोई नहीं जानते हैं। अथाह बच्चे हैं। प्रजापिता ब्रह्मा सो तो जरूर प्रजा का ही बाप होगा। क्रियेटर ब्रह्मा द्वारा सृष्टि रचते हैं। ब्रह्मा द्वारा तुम बच्चों को शिक्षा देता हूँ। लाडले बच्चे, मुझे निरन्तर याद करो तो तुम पतित से पावन बनते जायेंगे और तुम्हारी बुद्धि का ताला खुलता जायेगा। पत्थर से पारस बुद्धि बनाने की सेवा करने आया हूँ। नर्क से स्वर्ग में ले जाता हूँ। बाप आते ही हैं संगम पर। जबकि सारी सृष्टि पतित तमोप्रधान जड़जड़ीभूत बन जाती है। एक-दो को दु:ख देने लग पड़ते हैं। काम कटारी चलाकर एक दो को दु:ख देते हैं। अभी तुम बच्चे जानते हो कि हम बाबा के पास शान्तिधाम में जायेंगे फिर सुखधाम में आयेंगे। बाप कहते हैं तुम बच्चों को रूहानी नयनों पर बिठाकर स्वीट होम ले जायेंगे। अब तुम भी पण्डे के बच्चे पण्डे बनते हो। तुम्हारा नाम भी है शिव शक्ति पाण्डव सेना। हरेक को अपने बाप का परिचय दे बाप के पास जाने का रास्ता बताते हो। तुम्हें खुद भी वर्सा लेना है और औरों को भी देना है।देखो, मेरठ से 22 की पार्टी आई है। मेहनत करते हैं, हरेक को कौड़ी से हीरे जैसा बनाने की राह बताते हैं। गाया भी जाता है - भगवान्, अन्धों की लाठी तुम। बाप आकर काँटों की दुनिया से फूलों की दुनिया में ले जाते हैं। तुम जानते हो असुर से फिर देवता बन रहे हैं। हम ही इन वर्णों से चक्र लगाकर आये हैं। अब शूद्र से ब्राह्मण बन फिर सो देवता बनेंगे। तुम हो गये स्वदर्शन चक्रधारी। यह अलंकार हैं तुम्हारे। परन्तु विष्णु को दे दिये हैं क्योंकि तुम्हारा स्थाई तो यह पार्ट रहता नहीं इसलिए देवताओं को यह निशानी दे दी है। बाप तो बच्चों पर तरस खाते हैं। कहाँ माया का असर न लग जाये। बाप को याद नहीं करेंगे तो माया जरूर खा जायेगी। बाबा जास्ती मेहनत नहीं देते हैं। सिर्फ कहते हैं मुझ बाप को याद करो। अपने को आत्मा निश्चय करो। यह है रूहानी यात्रा। तुम भी यात्रा करो। बाप को थोड़ेही भूलना चाहिए। योग अक्षर निकाल दो। बाप को याद करना है। क्या बाप को तुम भूल जाते हो? बाप कहते हैं अशरीरी बन जाओ। तुम अशरीरी हो। यहाँ आकर यह शरीर धारण किया है। अब फिर शरीर का भान छोड़ो। मैं वापिस ले चलूँगा। मैं कालों का काल हूँ। इस पुरानी देह को भूल मुझे याद करो। यह पुरानी जूती है। फिर तुमको नया शरीर देंगे। पुराने से ममत्व मिटाओ। मैं तुमको साथ ले जाऊंगा। तो खुश होना चाहिए कि हम जाते हैं पियर घर। पाँच हजार वर्ष हुए हैं, हमने शान्तिधाम को छोड़ा है। अब फिर हम जाते हैं। यह है दु:खधाम। बाप आकर बच्चों की सेवा करते हैं। आत्मा जो छी-छी बनी है, उनकी ज्योति जगाते हैं। सपूत बच्चे जो होंगे वह कहेंगे हम तो श्री नारायण को वरेंगे। बाप कहते हैं - अपना दिल दर्पण देखो - कोई भूत तो नहीं बैठा है? भूतों को भगाते रहो ताकि भूतों का राज्य ही खत्म हो जायेगा। बाप तो बच्चों की सेवा में उपस्थित है। वह तो विचित्र है, कोई चित्र नहीं है। दूसरे के आरगन्स द्वारा बाबा पढ़ाते हैं। वास्तव में तो विचित्र सब आत्मायें हैं। फिर बाद में चित्र लेकर पार्ट बजाती हैं। बाप कहते हैं मैं इस चित्र वा प्रकृति का आधार लेता हूँ, माताओं को ज्ञान कलष देता हूँ।जब तुम बच्चे बाप को जान जाते हो तब ही वर्सा मिलता है। अच्छा!मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते। धारणा के लिए मुख्य सार:- 1) बाप को याद कर, बाबा की श्रीमत पर चल पूरा माया के श्राप से मुक्त होना है। 2) देह का भान छोड़ अशरीरी बनना है, पुरानी दुनिया से ममत्व मिटा देना है। वरदान:- स्व-स्थिति की शक्ति से किसी भी परिस्थिति का सामना करने वाले मास्टर नालेजफुल भव! स्व-स्थिति अर्थात् आत्मिक स्थिति। पर-स्थिति व्यक्ति वा प्रकृति द्वारा आती है लेकिन अगर स्व-स्थिति शक्तिशाली है तो उसके आगे पर-स्थिति कुछ भी नहीं है। स्व-स्थिति वाला किसी भी प्रकार की परिस्थिति से घबरा नहीं सकता क्योंकि नॉलेजफुल आत्मा हो गई। उसे तीनों कालों की, सर्व आत्माओं की नॉलेज है। वह जानते हैं कि यह परवश है इसलिए शुभ भावना, शुभ कामना द्वारा उसकी सेवा करेंगे, घबरायेंगे नहीं, सदा मुस्कराते रहेंगे। स्लोगन:- भाग्यवान वह है जो सदा भाग्य के गुण गाये, कमजोरियों के नहीं। #brahmakumaris #Hindi #bkmurlitoday
- Creation of the World, Evolution of Life - Part 2
(Read Part 1)God reminds souls that He is their spiritual father and that they can fill themselves with His powers and virtues simply by being aware that they are souls and remembering Him. Such remembrance of God is called Rajyoga. Since this is an easy method of meditation and does not involve any physical rigours, chanting or other rituals it is also called easy yoga. Being easy, it can be practiced constantly. Regular practice of this form of meditation eventually makes one naturally soul conscious — aware that one is a soul, a sentient point of light separate from the body but living within the body and using it as a medium to think, feel, see, hear, smell, speak and act. This mental link with the Supreme Soul also fills the soul with God’s powers and virtues. When the soul is enriched and strengthened in this way, it is no longer influenced by vices and consequently gets liberated from sorrow. The thoughts, words and actions of such purified souls spread peace and happiness all around. When a critical number of humans start transmitting positive energy all over the world in this way, all negativity begins to get eliminated and the elements of nature also get purified. In this process the world undergoes a major transformation whereby the Iron Age ends and the planet returns to its pristine state for the Golden Age to dawn once again. God and all human souls return to the soul world at this time, just as the director and actors in a play go home at the end of a performance, to come down again and play their respective roles when the drama begins anew as the wheel of time begins to turn a new circle. This cyclical process goes on eternally, with rejuvenation taking place at the end of each turn of the wheel of time through the intervention of God. This cyclical process goes on eternally, with rejuvenation taking place at the end of each turn of the wheel of time through the intervention of God. The soul of Brahma, by virtue of being the first soul to achieve complete self-transformation and playing a key role in bringing about this rejuvenation, goes on to play the most prominent role in the Golden Age – that of Shri Krishna. However, since the Supreme Soul is always incorporeal and Brahma was His visible medium, people have attributed the task of creation of the new world to Brahma. They have also mistakenly credited Shri Krishna with giving humans spiritual knowledge in the form of the Bhagavad Gita as is depicted in the Mahabharata. The battle shown in the Mahabharata is a spiritual one that each soul has to fight within itself to overcome vices and negative tendencies. God helps us in this battle by reminding us of our original goodness and empowering us to return to that state. Those who recognize the truth revealed by God and make the effort to transform themselves attain the powers and virtues that entitle them to play a leading role in the world drama right from the start of the Golden Age. It is an entitlement God offers to all His children. Claiming it is up to us. Om Shanti. #bkmurlitoday #english #Murli
- BK murli today in Hindi 15 June 2018 - Aaj ki Murli
Brahma Kumaris murli today in Hindi - Aaj ki Murli - BapDada - Madhuban - 15-06-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन “ मीठे बच्चे-मन्मनाभव रूपी इन्जेक्शन सर्व दु:खों की बीमारी से मुक्त करने वाला है, देही- अभिमानी बनो तो पवित्रता-सुख-शान्ति का वर्सा मिल जायेगा” प्रश्न: बाप की किस महिमा का प्रैक्टिकल टेस्ट तुम बच्चों ने किया है? उत्तर- बाप की महिमा में गाते हैं-कितना मीठा, कितना प्यारा शिव भाेला भगवान... इसका प्रैक्टिकल टेस्ट तुम बच्चों ने किया है। तुम अनुभव से कहते हो मीठा बाबा हमको कितना मीठा बना रहे हैं! बाबा अपने मीठे बच्चों को आशीर्वाद भी करते-बच्चे, सदा जीते रहो। मोस्ट बिलवेड बाप के बने हो तो उन जैसा मीठा फूल बनो। गीत: धीरज धर मनुवा... ओम् शान्ति।मनुष्य जब बीमार होते हैं तो सर्जन धीरज देते हैं छूटने लिए। वह तो है जिस्मानी बीमारी। अब तुम बच्चों को पता पड़ा है कि यह है रूहानी सर्जन। रूह को ही बीमारी लगी है, इसलिए रूह को ज्ञान का इन्जेक्शन लगा रहे हैं। आत्मा को ही ज्ञान इन्जेक्शन लगता है, न कि शरीर को। कोई सुई वा दवाई आदि नहीं है। यह एक ही इन्जेक्शन काफी है। कौन सा इन्जेक्शन? मन्मनाभव, अशरीरी भव-यह इन्जेक्शन है। देही-अभिमानी हो रहने से पवित्रता-सुख-शान्ति का वर्सा जमा होता है। जितना-जितना देही-अभिमानी बन बाप को याद करते रहेंगे, उतना वर्सा जमा होता रहेगा। बच्चे जानते हैं आधा-कल्प के दु:ख दूर करने वाला आया हुआ है। हर-हर महादेव कहते हैं। अब वह महादेव नहीं है, दु:ख तो बाप ही हरेंगे। दु:ख हर कर सुख देने वाला बाप है। बच्चे जानते हैं बरोबर हम आधा-कल्प से कुछ न कुछ दु:ख देखते आये हैं। अब बीमारी बढ़ गई है। पाँच विकारों ने बहुत दु:खी किया है इसलिए बाप कहते हैं यह जो कल्प का खाता है, उनको अब ठीक करो। व्यापारी लोग 12 मास का खाता ना और जमा का रखते हैं ना। नौकरी वाले ना व जमा को नहीं जानते। ऊंच ते ऊंच व्यापार है जवाहरात का। यह भी हैं ज्ञान-रत्न। व्यापारी लोग जानते हैं हमारी कमाई होती है या कहाँ नुकसान होता है। कभी नुकसान, कभी फायदा, यह तो चलता ही है। बाप कहते हैं तुम्हारा आधा-कल्प जो खाता ना की तरफ चला गया है, अब फिर जमा करना है। ना की तरफ क्यों गया है? क्योंकि तुम देह-अभिमानी बन पड़े हो, माया रावण ने खाता खराब कर दिया है। माया ने सबको घाटे में डाला है इसलिए कंगाल बन पड़े हैं। अभी तुम बच्चे कहते हो-बाबा, आप तो सत्य कहते हो, बरोबर माया ने बड़ा घाटा डाला है। घाटा होते-होते सब कौड़ी तुल्य बन पड़े हैं। अभी सत्य बाप हमको नर से नारायण बनने की मत दे रहे हैं। जिस श्रीमत से हम श्रेष्ठ बनेंगे और हमारा आधा-कल्प के लिए जमा हो जाता है। यह एक ही बार खाता जमा होता है। बाप कहते हैं अच्छी रीति खाता जमा करना है। श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ पद पाना है तो देही-अभिमानी भव। बाप को याद करो। आत्मा ही पतित बनती है इसलिए पाप-आत्मा, पुण्य-आत्मा कहा जाता है। पाप शरीर नहीं कहा जाता है। पाप-आत्मा बनाती है माया रावण। बाप को याद ही नहीं करते तो पुण्य-आत्मा कैसे बनें। अशुद्ध अहंकार है नम्बरवन भूत। माया ने कितना घाटा डाला है। दुनिया में इस फायदे और घाटे का किसको पता नहीं है। यह बाप ही बतलाते हैं। श्रीमत भगवानुवाच। भगवान एक होता है जो आकर राजयोग सिखलाते हैं। यह योग बहुत फायदे का है। मनुष्य को चढ़ा देता है। सिर्फ एक बात में निश्चय रहे और एक बाप को याद करते रहो, बस। यह तो जानते हो धीरज रखना है। बरोबर हमारी तकदीर जगी है। बाबा हमको पार ले जाने वाला है। इस वेश्यालय से शिवालय में ले जाने बाबा आया है। खिवैया एक ही है। पतित-पावन ही खिवैया ठहरा। होशियार तैरने वाले जो होते हैं वह बहुत युक्ति से तैरते हैं। सहज रीति तैरना सिखलाते हैं। तुम बच्चे भी जानते हो-बाबा हमको कितना सहज कलियुगी किनारे से सतयुगी किनारे में ले जा रहे हैं, बुद्धियोग अथवा याद द्वारा। यह आत्माओं से बात कर रहे हैं। बाप ही आकर आत्माओं की ज्योति जगाते हैं। उनको शमा भी कहा जाता है। ज्योति स्वरूप भी कहा जाता है। मनुष्य मरते हैं तो दीवा जगाकर रखते हैं। उसमें घृत डालते रहते हैं। तुमको ज्ञान घृत आधा-कल्प से कहाँ भी न मिलने कारण सबके दीवे प्राय: जैसे बुझ गये हैं। बाकी थोड़ा जाकर रहा है। इस समय है घोर अंधियारा। सतयुग में होता है घोर सोझरा। अब फिर से तुम आत्माओं के दीप जग रहे हैं। साथ में ज्ञान का तीसरा नेत्र भी तुमको मिल रहा है। पत्रों में भी लिखते हैं मीठे-मीठे लाडले सिकीलधे बच्चों.... बाप भी बहुत मीठा है ना। तुमको प्रैक्टिकल में यह टेस्ट आती है कि बाबा कितना मीठा, कितना प्यारा है! हमको कितना मीठा बनाते हैं! यह भी तुम जानते हो-हम भी कितने मीठे, कितने प्यारे थे! फिर हम ही पूज्य से पुजारी बने तो खुद को पूजते रहे। हम सो लक्ष्मी-नारायण अथवा सूर्यवंशी थे। फिर हम सो चन्द्रवंशी बनें। अब फिर सूर्यवंशी बनते हैं अर्थात् फायदे में जाते हैं, इसलिए बाप को याद करना है और पढ़ना है। यह बड़ी वन्डरफुल बातें हैं। गाते भी हैं जनक को सेकेण्ड में जीवनमुक्ति मिली। हमको भी जनक मिसल ज्ञान चाहिए। जनक तो तुम सब हो ना। घर के मालिक हो ना। कोई बड़ा धनवान है, कोई कम। जनक तो हो ना। गरीब भी अपने को घर का मालिक समझेगा। तो तुम हरेक अपने को जनक समझो। सेकेण्ड में जीवनमुक्ति मिलती है। गरीब निवाज बाप को कहते हैं क्योंकि सबसे गरीब भारतवासी ही बने हैं। अभी तो तुमको बिल्कुल बेगर बनना है। यह देह भी अपनी न समझो। एक कहानी है ना-कहा, लाठी भी न उठाओ। बाप कहते हैं मुख्य है देह अहंकार। उसको भूलो। एव बाप को याद करो। यह तुम सब जानते हो-मैं आत्मा हूँ, यह शरीर है। एक शरीर छोड़ दूसरा लेते हैं। पुनर्जन्म को सब मानते हैं। जरूर जिस युग में रहेंगे पुनर्जन्म भी वहाँ ही मिलेगा। चौरासी जन्म हैं ना। यह चक्र है। तुम बच्चों से ही आदि शुरू होती है। फिर नीचे आते हो। यह स्वदर्शन हुआ। तीसरा नेत्र भी तुमको मिला है। जितना-जितना बाप को याद करेंगे, उतना ऊंच पद पायेंगे। जीवनमुक्ति तो सभी को मिलती है। पहले तो मुक्ति में जाना है। तुम भी पहले मुक्ति में जाते हो फिर जीवनमुक्ति में आयेंगे। स्वर्ग में पहलेपहले देवी-देवता धर्म वाले आयेंगे, जो धर्म अभी प्राय: लोप हो गया है। अब बाप आशीर्वाद करते हैं-मीठे-मीठे बच्चों, सदा शान्ति भव। चिरन्जीवी भव अर्थात् बहुत जन्म जिओ। आशीर्वाद तो बाप से मिलती है। परन्तु फिर हर एक को अपना पुरूषार्थ करना है कि हम चिरन्जीवी कैसे बनें। बाप को याद करने से ही तुम चिरन्जीवी बन रहे हो। यह आशीर्वाद बाप करते हैं। ब्राह्मण लोग भी कहते हैं आयुषवान भव। बाप भी कहते हैं-सदा जीते रहो बच्चे। तुम भी समझते हो हम चिरन्जीवी बन रहे हैं। आधाकल्प के लिए कभी काल नहीं खायेगा। सतयुग में मरने का नाम नहीं होता। यहाँ तो मनुष्य मरने से डरते हैं ना। तुम तो पुरूषार्थ कर रहे हो मरने लिए। शरीर छोड़ हम अपने बाप पास जायेंगे, स्वर्गवासी बनने। निर्वाणधाम जाने लिए सिर्फ पुरूषार्थ करते हो, सन्यासी नहीं कर सकते। वह न खुद मुक्ति पाते हैं, न किसको देते हैं। तुम जानते हो हम बाबा को याद करते-करते बस शरीर छोड़ देंगे। कोई कहते हैं-बाबा, हम जल्दी जावें। कब विनाश होगा? हम कब जायेंगे? तुम ऐसे मत कहो-हम कब जायेंगे! यह कहना माना बाबा आप वापिस कब जायेंगे! यह हिसाब हुआ। तुम शिवबाबा पास बैठे हो। तुम ईश्वरीय सन्तान हो। तुम्हारा ही यादगार बना हुआ है। मोस्ट बिलवेड बाप के बच्चे बने हो, तो तुमको भी बाप जैसा बहुत मीठा, बहुत प्यारा बनना है और सबको बनाना है। टाइम तो लगता है। कोई बहुत तीखी दौड़ी लगाते हैं, कोई कम। कल्प पहले मुआिफक कहेंगे इस समय तक फलाने इतनी दौड़ी पहन फूल बने हैं। इतनी कली बने हैं। कोई तो कली बन कली से फूल बन, फिर काँटे बन पड़ते हैं। माया का तूफान आया तो न कली, न फूल रहे। बड़े काँटे बन जाते हैं। बहुत अबलाओं पर अत्याचार होने लग पड़ते हैं। बाँध हो जाती हैं। बहुत नुकसान हो जाता है। वृन्दावन की बात है-अन्दर डान्स होता था..... है यह ज्ञान डान्स की बात। तुम बच्चे कहाँ-कहाँ से आते हो ज्ञान डान्स सीखने। तब बाबा कहते हैं बादल वह जो रिफ्रेश हो फिर ज्ञान डान्स करें। बाबा कहते हैं बाकी थोड़े रोज हैं। यह तो बड़ा अच्छा समय है। जितना भी टाइम हो उतना अच्छा। हमारी अवस्था पक्की होती जायेगी। बाप रत्न देते आये हैं ना। अभी तो अजुन बहुत कच्चे हैं। सबका जमा नहीं होता है। बहुत बड़ी राजधानी स्थापना होनी है। यह तुम ही जानते हो कि हम बाप को याद करने से राजधानी स्थापना करते हैं। बाप और खजाना याद रहता है। याद से ही हम अपना स्वराज्य स्थापना करते हैं। स्व आत्मा को अभी राजाई नहीं है। अब फिर हम सो राजाओं का राजा बनेंगे। यह नशा आत्मा को रहता है। आत्मा इन आरगन्स द्वारा वर्णन करती है। आत्माओं को ही यह सृष्टि चक्र का नॉलेज मिला है। बीज और झाड़ को जान गये हैं। बाप कहते हैं हम तुम कल्प पहले भी थे, अब हैं फिर कल्प बाद भी होंगे। सारे कल्प वृक्ष को जान लिया है। पहलेपहले बाप की पहचान देनी है। यह सब आत्माओं का निराकारी बाप है। पहले-पहले ब्राह्मणों को रचते हैं। शूद्र वर्ण को ब्राह्मण वर्ण बनाते हैं। यह है टॉप मोस्ट सिजरा। ब्राह्मण से देवता फिर क्षत्रिय, फिर इस्लामी, फिर बौद्धी आदि-आदि सब निकलते हैं। यह है ग्रेट-ग्रेट ग्रैण्ड फादर, जिस्मानी बाप ऊंच ते ऊंच ब्रह्मा। रूहानी बाप शिवबाबा। मूलवतन, सूक्ष्मवतन और स्थूलवतन। ब्रह्मा द्वारा यह ब्राह्मण पैदा हुए। फिर यह देवता, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र बनेंगे। नटशेल में सारा बुद्धि में है। शरीर निर्वाह भी करना है क्योंकि तुम कर्मयोगी हो। नौकरी आदि धन्धा करने लिए 8 घण्टा तुमको फ्रा है। वह तो करना ही है। गवर्मेन्ट की नौकरी 8 घण्टा होती है। गवर्मेन्ट का भी फिर चीफ जस्टिस होता है। परन्तु वह तो पूरी जजमेन्ट नहीं देते। यह पाण्डव गवर्मेन्ट भी है तो फिर धर्मराज भी है। बच्चों को समझाया जाता है अगर अच्छी रीति बाबा की सर्विस में नहीं रहे, देही-अभिमानी न बने और कोई उल्टा काम कर लिया तो उन पर दण्ड बहुत पड़ जाता है। यह हाईएस्ट गवर्मेन्ट भी है, हाईएस्ट सुप्रीम जज भी है। कोई गफलत की तो फिर ट्रिबुनल बैठेगी। खास तुम बच्चों के लिए। जो जैसा कर्म करते हैं वैसा उसको फल मिलता है। यह है रूहानी गवर्मेन्ट। रूह को सजा मिलती है। यहाँ तो स्थूल सजा मिलती है। वह फिर है गुप्त सजा, गर्भ में सजा भोगते हैं। फिर कहते हैं हमको बाहर निकालो। परन्तु जेल बर्ड तो आधा-कल्प बनना ही है। फिर आधा-कल्प तुम गर्भ महल में रहते हो। बाप कहते हैं तुम बच्चों की मैं कितनी सर्विस करता हूँ, इस पतित दुनिया, पतित शरीर में आकर। मुझे आना भी इसमें ही है, जिसका नाम ब्रह्मा रखा है। ब्रह्मा-सरस्वती ही श्री नारायण और श्री लक्ष्मी बनते हैं, ततत्वम् उनके बच्चे। तुम जानते हो हम माँ-बाप के तख्त पर जीत पहनने वाले हैं। एक दो का वारिस बनते जाते हैं। पहले वाले फिर नीचे आते जाते हैं। यहाँ फिर कहा जाता है माया पर जीत पहनो तो स्वर्ग के मालिक बनोगे। पतित मनुष्य स्वर्ग का मालिक बन न सकें। बाबा कहते हैं ड्रामा में कल्प-कल्प मेरा ही पार्ट है। तुम जानते हो अभी ड्रामा पूरा होता है। सतयुग की हिस्ट्री-जॉग्राफी फिर से रिपीट होगी। फिर हम ही देवी-देवता बनेंगे। तुम इस चक्र को जानते हो। तुम्हारी तकदीर जगी हुई है। ज्ञान सूर्य तुम्हारी तकदीर जगा रहे हैं। तकदीर पर लकीर लगाता है-देह-अभिमान। मूल बात है देही-अभिमानी बनो। बाप को याद करो। अपने को आत्मा समझो। कितनी सहज बात है। तुम जानते हो 5 हजार वर्ष की यह बात है। मूल बात बाबा समझाते हैं-देही-अभिमानी बनते रहो। समझाना है भगवान तो एक है ना, जिसको भक्त याद करते हैं। भक्त ही भगवान होते तो फिर याद किसको करते। भक्त अथवा साधू साधना करते हैं भगवान की। कहते हैं ज्योति ज्योत समायेंगे। परन्तु निर्वाणधाम का मालिक तो चाहिए ना। ऐसे नहीं ब्रह्म ही भगवान है। भगवान कहते हैं-तुम्हारा यह भ्रम है। मैं तो ब्रह्म में रहने वाला स्टॉर हूँ। जैसे आत्मा में 84 जन्मों का अविनाशी पार्ट नूंधा हुआ है, यह कभी विनाश नहीं हो सकता। ऐसे बाप कहते हैं मैं आत्मा भी इस ड्रामा के बन्धन में हूँ। यह फिर हूबहू रिपीट होगा। अच्छा! मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते। धारणा के लिए मुख्य सार: 1) अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान कर सच्चा व्यापारी बनना है। सच्चा धन्धा करना है। 2) देही-अभिमानी बनने की मेहनत करनी है। ज्ञान डान्स सीखनी और सिखानी है। वरदानः करनकरावनहार की स्मृति से विघ्नों के बीज को समाप्त करने वाले समर्थ आत्मा भव l सर्व प्रकार के विघ्नों का बीज दो शब्दों में हैं: 1-अभिमान और 2-अपमान। सेवा के क्षेत्र में या तो अभिमान आता कि मैंने यह किया, मैं ही कर सकता...या तो मेरे को आगे क्यों नहीं रखा गया, मेरे को यह क्यों कहा गया, यह मेरा अपमान किया गया। यही भावना भिन्न-भिन्न विघ्नों के रूप में आती है। जब खुदाई खिदमतगार हैं, करनकरावनहार बाप है तो अभिमान कहाँ से आया, अपमान कहाँ से हुआ? इसलिए कम्बाइन्ड रूप की स्मृति द्वारा समर्थ आत्मा बनो तो विघ्नों का बीज सदा के लिए समाप्त हो जायेगा। स्लोगनः ज्ञान स्वरूप बनना है तो बाप और पढ़ाई से समान प्यार हो। #bkmurlitoday #brahmakumaris #Hindi
- BK murli today in Hindi 14 June 2018 - Aaj ki Murli
Brahma Kumaris murli today in Hindi - BapDada - Madhuban - 14-06-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन“ मीठे बच्चे-सर्विस की नई-नई युक्तियाँ निकालते रहो। भारत को दैवी स्वराज्य बनाने में बाप का पूरा-पूरा मददगार बनो” प्रश्न: बाप बच्चों को कौन-सी स्मृति दिलाकर एक आश रखते हैं? उत्तर- बाबा स्मृति दिलाते-बच्चे, तुम कल्प-कल्प मायाजीत जगतजीत बने हो। तुमने मात-पिता के तख्त पर जीत पाई है इसलिए अभी तुम्हें माया के तूफानों से डरना नहीं है। कभी भी माया के वश होकर कुल कलंकित नहीं बनना है। लाडले बच्चे, इस बूढ़े बाप की दाढ़ी की लाज रखना। ऐसा कोई काम न हो जो बाप का नाम बदनाम हो जाये। तुम योग बल से विकारों को भगाते रहो, बाप समान निराकारी, निरहंकारी बनो। गीत: दर पर आये हैं कसम ले के... ओम् शान्ति।मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चे अच्छी रीति जान गये हैं कि बेहद के बाप से बच्चों को प्यार मिलता है जरूर। जैसे हद के लौकिक बाप अपने रचे हुए बच्चों को प्यार करते हैं। अच्छी तरह से सम्भालते हैं, उनकी सेवा करते हैं कि हमारा कुल वृद्धि को पाये। भक्ति मार्ग में भी बेहद के बाप को सभी याद करते हैं। जरूर कभी बाप से मिलना होता है। यहाँ भी बाप तो कहते हैं-मैं तुम्हारा बाप भी हूँ, शिक्षा देने वाला भी हूँ अर्थात् ड्रामा के आदि, मध्य, अन्त की नॉलेज देने वाला भी हूँ। इसको ही ज्ञान कहा जाता है। बाकी शास्त्रों में है भक्ति मार्ग का ज्ञान। उससे कोई मुक्ति-जीवनमुक्ति नहीं मिल सकती। बाप कहते हैं सर्व का मुक्ति-जीवन्मुक्ति दाता मैं हूँ। मुझे ही मुक्ति-जीवन्मुक्ति देने के लिए आना पड़ता है। तो कल्प-कल्प, कल्प के संगम पर मुझे ही आना पड़ता है। ड्रामा अनुसार माया 5 विकार तुमको दु:खी बना देते हैं। तुम जानते हो अभी दु:ख के पहाड़ गिरने हैं। विनाश होना है। उसी समय खूनी नाहेक खेल का पार्ट बजना है। कितनी खून की नदियाँ बहेंगी और सतयुग में घी की नदियाँ बहनी हैं। खून की नदियाँ बहती हैं फिर उसी समय हाहाकार हो जाता है। बहुत दु:खी होंगे। अब बच्चों को अच्छी तरह बाबा की सर्विस भी बढ़ानी है। तुम मददगारों से ही भारत स्वर्ग बनता है। तुम जानते हो हम ही सिकीलधे ब्राह्मण कुल भूषण बच्चे भारत को फिर से दैवी स्वराज्य बनाते हैं। बाबा से दैवी स्वराज्य का वर्सा लेते हैं। बाबा कहते हैं-बच्चे, सर्विस की युक्तियाँ निकालते रहो। बाबा का भी ख्याल चलता है ना। इसको ही स्वदर्शन चक्र कहा जाता है। यह बहुत अच्छी चीज है, इससे तुम सर्विस बहुत अच्छी कर सकते हो। यह राजधानी स्थापना करने में अथवा भारत को रावण राज्य से बदल राम राज्य स्थापना करने में कोई खर्च नहीं है। तुम हो ही नान- वायोलेन्स, अहिंसक। सर्व गुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी, अहिंसा परमो-धर्म वाले तुम बनते हो। तुम कहते हो हमको बाबा का मददगार बनकर भारत को हीरे जैसा बनाना है। कल्प-कल्प हम यह सर्विस करते रहते हैं। अभी हम हैं गॉड फादरली सर्विस पर। गॉड फादरली स्टूडेण्ट भी हैं, गॉड फादरली चिल्ड्रेन भी हैं। हमारे ऊपर बहुत बड़ी रेस्पान्सिबिलिटी है। बच्चे जो बनते हैं उन पर रेस्पान्सिबिलिटी रहती है। बाबा कहते हैं खबरदार रहना, कोई भूल चूक नहीं करना। बाबा किस्म-किस्म की सर्विस बताते हैं। किस प्रकार भारतवासियों को बेहद के बाप से वर्सा लेने का रास्ता बतायें। समझाया जाता है यह वर्सा तो 21 जन्म सतयुग का जन्म-सिद्ध अधिकार है। सतयुगी डीटी सावरन्टी इज योर गॉड फादरली बर्थ राइट। बाप है ही स्वर्ग की स्थापना करने वाला। पुरूषार्थ यहाँ करना है। ऐसे नहीं सतयुग में करेंगे। बाबा को समझाना पड़ता है तो सभी बच्चे सुनें। यह गोला है स्वदर्शन चक्र, यह आइरन सीट पर बड़े-बड़े बनवाकर फिर बड़े-बड़े स्थानों पर रखो। नीचे सब कुछ लिखा हुआ है। जो देखेंगे, समझेंगे यह तो राइट बात है। समय नजदीक होता जायेगा। मनुष्यों को यह दिल अन्दर आयेगा बरोबर अब सतयुग नजदीक है। समय प्रति समय बच्चों को सर्विस प्रति राय देते रहते हैं। ऐसे करो तो सर्विस बढ़ेगी। हरेक अपने घर में भी यह बोर्ड लगाओ। शिवबाबा का चित्र भी हो, यह है गीता का भगवान। फिर लिखा हुआ हो डीटी वर्ल्ड सावरन्टी आपका जन्म सिद्ध अधिकार है। हरेक अपने घर पर बोर्ड लगा दे। तुम ज्ञान गंगायें हो ना। बोर्ड देखकर बहुत आयेंगे। उनको समझाना है। तुम आत्माओं का बाप वह निराकार है। तुम भाई- भाई हो। हम उस बाप से वर्सा ले रहे हैं। आगे चलकर बहुत धूमधाम होगी कि वही भगवान आकर पधारे हैं। नाम तो है ब्रह्माकुमार-कुमारी। शिवबाबा का भी नाम है। आगे चलकर मनुष्य समझेंगे राजधानी तो जरूर स्थापना होगी। यज्ञ में विघ्न पड़ते हैं क्योंकि राजा-रानी तो कोई है नहीं। प्रजा का प्रजा पर राज्य है। कोई को समझाओ और वह ब्रह्माकुमारियों का तरफ ले तो भी हंगामा कर देंगे। समझते हैं सब धर्म मिल एक हो जायें। अब जो धर्म भिन्न-भिन्न हैं, वह सब एक कैसे होंगे। खुद कहते हैं हम कोई धर्म को नहीं मानते। अपने धर्म को भूलना, यह भी ड्रामा है। और धर्म स्थापना होते हैं तो देवी-देवता धर्म प्राय:लोप हो जाता है इसलिए सब अपने को हिन्दू कह देते हैं। देवता धर्म लोप है, तब बाबा कहते हैं फिर से हम देवी-देवता धर्म की स्थापना करने आये हैं। अनेक धर्मों का विनाश भी सामने खड़ा है। बाकी कितना समय ठहरेंगे। आफतें भी आनी हैं। मनुष्य तो कहते हैं सतयुग आने में लाखों वर्ष हैं। तुम जानते हो आज नर्क में हैं, कल स्वर्ग में जायेंगे। हम आत्मायें दौड़ रही हैं। अभी 84 जन्म पूरे हुए। दु:ख का पार्ट पूरा हुआ। बस बाबा, अभी हम आये कि आये। यह अन्तिम जन्म है। बाबा साजन आया हुआ है। कहते हैं अभी पवित्र दुनिया के लायक बनो तो साथ ले जाऊंगा। योग से लायक नहीं बनेंगे तो सजा खायेंगे। फिर पद भी कम हो जायेगा। बात तो बहुत सहज है। बेहद के बाप से बेहद का सुख मिलता है, इसलिए बेहद के बाप को और बेहद सुख के वर्से को याद करना है। जितना चाहिए याद करो, जितना याद करेंगे वैसा पद मिलेगा। आठ घण्टा जरूर याद करना चाहिए। पुरूषार्थ करना है। यह भी जानते हैं कल्प पहले मुआिफक ही बच्चे पुरूषार्थ करते हैं। इसको साक्षी हो देखा जाता है-कौन कितना पुरूषार्थ करते हैं, मोस्ट बिलवेड बाप से वर्सा लेने। कल्प-कल्पान्तर वही लेने लिए अधिकारी बनेंगे। बाप ने राजयोग सिखाया है स्वर्ग के लिए। लौकिक बाप भी बच्चों की कितनी सम्भाल करते हैं! बेहद के बाप को भी कितनी सम्भाल करनी पड़ती है। माया बड़ा हैरान करती है, बीमार कर देती है। फिर बाबा आकर दवाई देते हैं। यह है संजीवनी बूटी। बाकी कोई पहाड़ की बूटी हनूमान नहीं ले आया। सिर्फ बाप और वर्से को याद करना है। बाप को याद करने बिगर वर्से को याद नहीं कर सकेंगे। अब भक्ति मार्ग अर्थात् ब्रह्मा की रात पूरी होती है। फिर बाबा आकर दिन स्थापना करते हैं। आधा कल्प है ब्रह्मा का दिन, आधा कल्प है ब्रह्मा की रात। घोर अंधियारा है ना। घड़ी-घड़ी बच्चियाँ बैठ समझायें तो लौकिक-पारलौकिक मात-पिता का अच्छा शो करेंगी। बाप रचयिता का काम है-स्त्री-बच्चों आदि को अपना साथी बनाना। अपनी रचना को भी रास्ता बताना है। काम चिता का सौदा बदल ज्ञान चिता पर बैठना है। यह बोर्ड बहुत अच्छे बन सकते हैं। बाप को तो बहुत ओना रहता है। बाप निराकार, निरहंकारी है। कैसे बैठ बच्चों की पालना करते हैं। कहते हैं ना वाट वेंदे वामन फाथो.... (रास्ते चलते ब्राह्मण फँस गया) बाबा को थोड़ेही पता था कि ऐसे प्रवेश करेंगे, मैं ब्रह्मा बन फिर श्री नारायण बनूंगा। कितनी गाली खाई है! बाबा कहते हैं तुम्हारे से भी मेरी ग्लानी जास्ती करते हैं। तुमको तो करके एक दो गाली देते हैं, मुझे तो पत्थर भित्तर में ठोक दिया है। मेरी कितनी निन्दा की है! राज्य-भाग्य पाना है, तो गाली खाई तो क्या बड़ी बात है। मुझे तो आधा कल्प से गाली देते रहते हैं। यह भी ड्रामा का खेल बना हुआ है। बाबा कहते हैं-लाडले बच्चे, मैं इसमें आया हुआ हूँ। इनकी दाढ़ी का कुछ ख्याल रखो। इनकी दाढ़ी सो उनकी। अब कोई कलंक नहीं लगाना है। विकारों को योगबल से भगाते रहो। कल्प-कल्प तुम माया पर जीत पाकर जगतजीत बनते आये हो। स्वर्ग का मालिक प्रजा भी बनती है। परन्तु पुरूषार्थ कर मात-पिता के तख्त पर जीत पहनो। यह है ही राजयोग। बाप जानते हैं यह मम्मा-बाबा पहले नम्बर में जाते हैं। मम्मा कुवांरी कन्या, यह अधरकुमार है। घर में बच्चे ऐसा कुछ काम करते हैं तो बाप कहते हैं हमारे दाढ़ी की लाज रखो। नाम बदनाम न करो। अच्छी रीति घर-घर में बोर्ड लगा हुआ हो-आकर बेहद के बाप से वर्सा लो। राजाओं को, सन्यासियों को पिछाड़ी में जगना है। दिन-प्रतिदिन तुम भी तीखे होते जाते हो। शक्ति मिलती जाती है। देखते हो सामने विनाश खड़ा है, लड़ाईयाँ लग रही हैं और यह है रूद्र ज्ञान यज्ञ। हम ब्राह्मण हैं। ब्राह्मण फिर सो देवता बनेंगे। जितना पुरूषार्थ करेंगे, उतना ऊंच पद पायेंगे। दिन-प्रतिदिन बहुत सहज होता जाता है। बाप का रूप भी तो समझाया है। वह स्टॉर है। परन्तु नये को पहले ही यह नहीं बताना है। जब अच्छी रीति समझें। पूछे इतना बड़ा रूप है? तब समझाना है। यह साक्षात्कार तो बहुतों को होता है। परन्तु मतलब कुछ भी नहीं समझते। जैसे आत्मा चमकता हुआ स्टार है, वैसे ही बाप है। उनको भी परमपिता परम-आत्मा कहा जाता है। तो हो गया परमात्मा। वह इनमें आते हैं। आकर बाजू में बैठ जाते हैं। गुरू के बाजू में शिष्य बैठ जाते हैं ना। वह सिखलाते हैं तुम बच्चों को। यह भी बाजू में रहते हैं। बापदादा कम्बाइण्ड है। परन्तु गुह्य राज है। जब कोई पूछे तब समझाना है। नहीं तो बाबा-बाबा कहते रहो। बाबा स्वर्ग के लिए राजयोग सिखलाते हैं। यह तो बच्चे जानते हैं इस समय तक जो पास्ट हुआ सो ड्रामा। विघ्न तो पड़ते रहेंगे। बच्चों को भी माया जोर से तूफान में लायेगी। परन्तु हाथ नहीं छोड़ना है। माया अजगर है। अच्छे-अच्छे लाल को भी खा लेगी। कल्प पहले भी हुआ था। जो तीखे विशालबुद्धि बच्चे हैं वह हर बात को समझ सकते हैं। विचार सागर मंथन करेंगे-हम ऐसे-ऐसे किसको समझायें, दान करें। बाबा रूप-बसन्त है। तुम भी रूप-बसन्त हो। बाबा कहते हैं मैं स्टार हूँ, मेरे में ये पार्ट भरा हुआ है। हर एक आत्मा में पार्ट भरा हुआ है। यह बातें साइन्स घमण्डी समझ न सकें। वह रिकॉर्ड घिस जाये, टूट-फूट जाये, यह आत्मा स्टार इमार्टल है, जिसमें इमार्टल पार्ट भरा हुआ है। इसका कभी एण्ड (अन्त) नहीं होता। एण्ड नहीं तो आदि भी नहीं, चलता आता है। इस ड्रामा के राज को भी तुम समझते जाते हो। तुम हो - नैनहीन अन्धों की लाठी। उन्हों को रास्ता बताना है। अभी सबकी वानप्रस्थ अवस्था है। वाणी से परे जाना है। बाबा कहते हैं मैं सबको ले जाऊंगा इसलिए जितना हो सके बाप को याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। इसको रूहानी यात्रा कहा जाता है। बाबा कहते हैं-हे राही बच्चे, थक मत जाना। बाप और रचना को याद करना है। रचना का मालिक बनना है। यह तो अति सहज है। हमेशा शिवबाबा को याद करते रहो। मोटर चलाते भी बुद्धि का योग कहाँ रहना चाहिए? बाबा अपना मिसाल बताते हैं-हम नारायण की पूजा करने बैठता था तो बुद्धि और तरफ चली जाती थी। फिर अपने को चमाट मारता था। तो अभी भी बुद्धि दौड़ती है। पुरूषार्थ करते-करते उनकी याद में शरीर छोड़ना है। मनुष्य भक्ति करते हैं कि कृष्ण की याद में हम शरीर छोड़ें तो कृष्णपुरी पहुँच जायें। परन्तु कृष्ण तो सबका बाप नहीं है। बाप सभी का एक है। सबका सद्गति दाता राम बाप ही आकर सब की सद्गति करते हैं। मुक्ति तो सबको मिल जाती है फिर जो भी आते हैं पहले उनको सुख देखना है जरूर। नई आत्मा ऊपर से आती है इसलिए उनका मान होता है। भल किसमें भी प्रवेश करती है तो उनका नाम बाला हो जाता है। तुम बच्चे जानते हो राजधानी स्थापना हो रही है। हम सो देवी-देवता बन रहे हैं। सिर्फ तुम ब्राह्मण ही संगमयुग पर हो, बाकी सब हैं कलियुग में। यहाँ आने वाले मानते जायेंगे बरोबर कलियुग का अन्त है। दुनिया बदल रही है। इसलिए ही यह महाभारी महाभारत लड़ाई है। तुम्हारे द्वारा सबको नॉलेज मिलती है। माताओं को लिफ्ट देने बाप आते हैं क्योंकि माताओं पर अत्याचार बहुत होते हैं। अच्छा!मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते। धारणा के लिए मुख्य सार: 1) मोस्ट बिलवेड बाप को याद करने का पुरूषार्थ कौन कितना करते हैं, यह साक्षी हो देखते, स्वयं 8 घण्टे तक बाप की याद में रहने का अभ्यास करना है। 2) बाप समान रूप बसन्त बन विचार सागर मंथन कर ज्ञान दान देना है। अन्धों की लाठी बनना है। वरदानः अल्पकाल के संस्कारों को अनादि संस्कारों से परिवर्तन करने वाले वरदानी महादानी भव l अल्पकाल के संस्कार जो न चाहते हुए भी बोल और कर्म कराते रहते हैं इसलिए कहते हो मेरा भाव नहीं था, मेरा लक्ष्य नहीं था लेकिन हो गया। कई कहते हैं हमने क्रोध नहीं किया लेकिन मेरे बोलने के संस्कार ही ऐसे हैं...तो यह अल्पकाल के संस्कार भी मजबूर बना देते हैं। अब इन संस्कारों को अनादि संस्कारों से परिवर्तन करो। आत्मा के अनादि ओरीज्नल संस्कार हैं सदा सम्पन्न, सदा वरदानी और महादानी। स्लोगनः परिस्थिति रूपी पहाड़ को उड़ती कला के पुरूषार्थ द्वारा पार कर लेना ही उड़ता योगी बनना है। #bkmurlitoday #Hindi #brahmakumaris
- 24 May 2018 BK murli today in English
Brahma Kumaris murli today in English - 24/05/18 Morning Murli Om Shanti BapDada Madhuban Sweet children, surrender everything you have, including your body, and then take care of it all as a trustee and your attachment will be removed from it. Question: What method should each Brahmin child definitely learn? Answer: :Definitely learn the method of doing service. Have the interest to prove who God is. You have received the Father's shrimat: Become sensible and give everyone the Father's message. Print such good introduction cards that people come to know that calling God omnipresent is to insult Him. You children can serve pilgrims very well. Song: What can storms do to those whose Companion is God? Om Shanti. You children heard the song. Only you children understand the meaning of this, because those who sang this song don't understand the meaning of it at all. Neither do they have God with them nor do they know when God comes and gives His children their inheritance of heaven. The Father Himself came and personally gave His children His introduction. That Father is now personally sitting in front of you and you are listening to Him. Only you understand the meaning of ‘storms’. Those people consider calamities to be storms. The storms that you experience are the storms of the five vices of Maya. Maya creates many obstacles to your efforts. However, you must not be concerned about them. Simply remember Baba very well and the storms will go away. The son of an emperor would have the faith that his father is an emperor and that he is the master of that sovereignty; he would have that intoxication. Among you children too, some of you have this firm faith and have made the Father belong to you. To make Him belong to you is not like going to your aunty's home! Mine is one Shiv Baba and none other, that’s all! Many children don't understand these things which is why the storms of Maya harass them and they then leave the Father. No one in the world knows God accurately. You children were originally residents of the Temple of Shiva (Shivalaya). This is now a brothel. At this time, human beings have become worse than monkeys. The anger of human beings is worse than that of monkeys. Even though they are human beings, they perform such actions, and this is why they are called worse than monkeys. No one knows who the greatest enemy of Bharat is, the one who made them worse than monkeys. The Father says: Look at your face in the mirror of your heart and see what were you before! The Father is now making you worthy. However, Maya makes those who don't follow shrimat unworthy. The Father gives you shrimat: Surrender everything you have including your bodies. Then Baba will make you trustees and enable you to end your attachment to them. It is very easy for you innocent mothers. When the kings of Rajasthan don't have their own children, they adopt children. When wealthy parents adopt a poor child, he becomes so happy: I am a master of so much property. Children of wealthy people also have a lot of intoxication that they are the children of multimillionaires. They don't know anything about this knowledge. You know how you have so much intoxication of this knowledge. By following shrimat, you become elevated whereas by not following shrimat, you don't become elevated. God says: You don’t have to be concerned about anything. Day and night, you should have the intoxication that Baba is giving you the inheritance of the kingdom of heaven for 21 births. We have become Baba's children. In fact, all are children of Shiv Baba, but Shiv Baba has now come and made you His children in a practical way. You are now sitting here personally and you know that Shiv Baba has made you belong to Him and is giving you directions to make you worthy of heaven: Children, don't become trapped in anyone's name or form. Only keep the name and form of Shiv Baba in your intellects. His name and form are different from those of human beings. The Father says: You used to belong to Me. You used to live in the land of nirvana. Have you souls forgotten that you are residents of the supreme abode, the land of peace, the land of nirvana (beyond sound) and that your original religion is peace? Those bodies are the organs with which to perform actions. How else would you play your parts? You don't know at all that we souls are residents of the incorporeal world. Only human beings would know all of these things; animals would not know them. They have said that God is omnipresent and they have thereby forgotten that they themselves are souls. They say that the Supreme Father, the Supreme Soul, sent Christ and Abraham here. Therefore, it was surely the Father who sent them here. You know that everyone continues to come here according to the drama. There is no question of sending anyone anywhere. At this time, human beings are in the darkness of ignorance. They neither know the Father nor themselves or creation. I am a soul and this body is separate. We souls have come from there. Baba alone reminds us of all of these things and He says: Remind everyone else too. You have had very good invitation cards printed. They also have a picture of Shiva. This is Baba, and this is Lakshmi and Narayan, the inheritance. It is written: Come and claim your inheritance from the Supreme Father, the Supreme Soul, to become like Lakshmi and Narayan. You are students who are changing from human beings into Narayan. When children of wealthy people study, they become so happy. However, they are nothing compared to us. They make effort for temporary happiness. You children will receive constant happiness. Only you can say this. Wherever you go, you should always have invitation cards with you. Explain to them: It is written on the card: “This is the Father of all souls, the Creator of heaven, and how you can receive the inheritance of heaven from Him.” You can drop these invitation cards from aeroplanes. You can even print it in newspapers. Then, big, eminent people will receive an invitation. These aeroplanes are for destruction and also for your service. Poor people cannot do this work, but the Father is the Lord of the Poor. Only the poor receive the inheritance. Wealthy people are trapped by attachment. Their hearts shrink in surrendering themselves. It is only at this time that the fortune of kumaris and mothers becomes bright. The Father says: I have to uplift Bharat, sages, scholars and holy men through you mothers. As you progress further, they will all come. At the moment, they think that there is no one like them. They don't know that the Father taught you Raja Yoga while you were living at home. Their hatha yoga and renunciation of karma is separate. God definitely comes and makes you into the masters of heaven. Therefore, you should have so much happiness. On the path of devotion, Baba used to keep a picture of Lakshmi and Narayan with him with a lot of love. He would be very happy seeing the picture of Shri Krishna. Baba explains to you children: If you want to benefit yourselves and others, keep yourself busy in service. The aim and objective is very clear. The inheritance is the deity world sovereignty. Up above is Shiv Baba and below Him are Lakshmi and Narayan. It is so easy to explain this. So, invite everyone! You are definitely to receive the inheritance of heaven from the unlimited Father. You must definitely distribute these leaflets where many people go. No one can say anything to you. If anyone does say something, we can explain and prove to him: How can you say that the Father from whom we receive the inheritance of heaven is omnipresent? The Father says: Look, you are insulting Me in this way. I made you into the masters of heaven and you then said that I am in the pebbles and stones! You are now receiving shrimat: Distribute many of these leaflets. Groups of people go on the pilgrimage to Amarnath and you can go there and distribute these leaflets. Written on them should be: I cannot be found by having sacrificial fires, doing tapasya and going on pilgrimages etc. However, those who explain to them have to be sensible. You have to explain that He is God, the Father. When you simply say, "Bhagwan, Ishwar, Paramatma", the word ‘Father’ is not included. When you say "God the Father", the word ‘Father’ is included. All of us are children of the one Father. If God is omnipresent, has He now become impure? He is the Highest on High. There is also a temple built as a memorial to Him. Therefore, you children should have the interest to do service tactfully. You can go on pilgrimages and do a lot of service. Those people are physical pilgrims whereas you are spiritual pilgrims. You should explain to them: Where are you going? Shankar and Parvati reside in the subtle region. How could they have come here? All of that is the path of devotion. So, you can do a lot of service in this way. Devotees, poor people, are stumbling around everywhere. Baba feels sorry for them. Tell them: You have forgotten your religion. Who established the Hindu religion? There is a lot of service to be done. You children have to become alert. The Father has come to give you the inheritance of heaven but, in spite of that, Maya catches hold of you by the nose and completely turns your face in the opposite direction. Therefore, remain very careful of Maya. You children are now sitting personally in front of BapDada. The world doesn't know that the Father has personally come here. The light of all souls has been extinguished. It hasn't been totally extinguished; a little light still remains. Then Baba comes and pours in the oil of knowledge. When a person dies, people light an earthenware lamp. Here, the lights of souls are awakened with yoga. You continue to imbibe knowledge. The ancient Raja Yoga of Bharat is very well known. Those of the path of isolation teach many different types of hatha yoga. There is no benefit through that; they continue to come down. No one except Yogeshwar (God of yoga) can teach yoga. It is God who teaches you yoga. He is incorporeal. The Father says: I am teaching you yoga. Your parts of 84 births have now ended. Some take 84 births, some take 60 and some even take one or two births. You children have to do a lot of service. Bharat itself was heaven; it was the kingdom of gods and goddesses. No one, apart from you, can explain these things. You are the ones who have to take insults. Baba had to take them, so can’t you children do the same? You have to tolerate the assaults. That too is fixed in the drama. The same will happen again. I am now making the intellects of you children divine. You should remember a great deal the Father who makes you into the masters of the world. He says: Children, may you remain alive! Claim the kingdom of heaven. Can you not remember such a sweet Father? Only by having remembrance will your sins be absolved. Any account of sin that still remains has to be settled here. If you don't have yoga, there will have to be punishment.At that time, Baba will grant you visions: You belonged to Me, you divorced Me and then became a traitor. You had visions in the beginning too. Achcha.To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children who are always safe and sound, love, remembrance and good morning from the Mother and Father. You children have to understand that you will shed your bodies and go to your sweet home. There is no pleasure at all in living here. We are now going to Baba. We have to remember Baba alone. From there, we will then go to the land of heaven. This pilgrimage is so wonderful! Maya causes a lot of obstacles in this. Achcha.To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children. Essence for Dharna: 1. Keep the name and form of Shiv Baba alone in your intellect. Do not become trapped in the name or form of anyone else.2. Don't be concerned about the storms of Maya. Mine is one Shiv Baba and none other: remove all storms in this way. Blessing: May you be a constant (non stop – akhand) server remaining free from any spinning of wasteful thoughts and do service free from obstacles. Everyone does service, but those who remain free from obstacles while serving have greater importance. Let there not be any type of obstacle in service. If there is any type of obstacle of the atmosphere, of the company or of laziness, that service is then damaged. A constant server can never be caught up in any obstacle. Let there not be the slightest obstacle even in your mind. Remain free from all the spinning of waste and you will be said to be a successful and constant server. Slogan: Those whose heads and hearts are honest are worthy of the Father’s and the family’s love. #english #Murli #bkmurlitoday #brahmakumari
- Hindi - BK murli today 3-05-2018
Brahma Kumaris murli today in Hindi - Aaj ki madhur Murli - BapDada - 03-05-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन "मीठे बच्चे - ऊंची मत एक बाप की है, उसी पर सदा चलते रहो, मातेले बन बाप से पूरा-पूरा वर्सा लो" प्रश्नः- सौतेले बच्चों को किस बात का निश्चय न होने के कारण बाप के पूरे मददगार नहीं बन सकते हैं? उत्तर:- सौतेले बच्चों को यह निश्चय ही नहीं होता कि अभी पवित्र बनने से ही पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे। बिना पवित्र बनें पवित्र दुनिया स्थापन नहीं हो सकती। यह निश्चय हो तो पूरे-पूरे मददगार बनें। मातेले बच्चे बाप को पूरा पहचान लायक बनने का पुरुषार्थ करते हैं। बाप की श्रीमत पर चल श्रेष्ठ बनते हैं। गीत:- तकदीर जगाकर आई हूँ.... ओम् शान्ति। बच्चों ने गीत सुना। यह बच्चों का कहना है कि हम पाठशाला में आये हुए हैं। इनको कामॅन सतसंग नहीं कहेंगे। सत के साथ संग तुम्हारा ही है। सत कहा जाता है एक परमपिता परमात्मा को। अब तुम बच्चे उस सत अर्थात् बेहद बाप के संग में बैठे हो। बाप हैं वास्तव में दो। हद का बाप और बेहद का बाप। एक है सभी आत्माओं का निराकारी बाप, दूसरा है प्रजापिता ब्रह्मा। तुम बच्चों को अब दोनों बाप मिले हैं। बेहद का बाप, जिसको परमपिता परमात्मा कहा जाता है, वह एक ही सब भक्तों का भगवान है। भक्त तो अथाह हैं। भगवान है एक। वह है निराकार बेहद का बाप। दूसरा है प्रजापिता ब्रह्मा बेहद का बाप और तीसरा है लौकिक बाप। शरीर तो विकार से जन्म लेने वाला है। उनको कुख वंशावली कहा जाता है। इस कलियुगी दुनिया को पाप आत्माओं की दुनिया कहा जाता है। दूसरी है पुण्य आत्माओं की दुनिया - वाइसलेस वर्ल्ड, नई दुनिया। दुनिया एक ही है, दो नहीं हैं। घर एक ही होता है, दो नहीं। शुरू में उसको नया घर कहा जाता है, फिर पुराना हो जाता है। भारत नया था तो उसको सतयुग कहा जाता है। अब पुराना है, तो उनको कलियुग कहा जाता है। इनको दु:ख देने वाली विकारी दुनिया कहा जाता है। जब विश्व नई थी तो भारत भी नया था। अब सृष्टि पुरानी है तो भारत भी पुराना हो गया है। नये भारत में सिवाए देवी-देवताओं के और कोई धर्म नहीं था। एक ही लक्ष्मी-नारायण का राज्य था और कोई खण्ड नहीं था, 5 हज़ार वर्ष की बात है। भारत को स्वर्ग कहा जाता था। दो कला कम हुई तो त्रेता में राम-सीता का राज्य हुआ। देवता, क्षत्रिय धर्म में आ गये। सतयुग त्रेता दोनों को मिलाकर सुखधाम कहा जाता है। जब दु:खधाम द्वापर से शुरू होता है तो भक्ति मार्ग शुरू होता है। भारत जो सद्गति में था सो दुर्गति में आ जाता है। पहले 16 कला सद्गति फिर 14 कला सद्गति फिर जब द्वापर से वाम मार्ग शुरू हुआ तो भारतवासी दु:खी होने शुरू हुए। दु:खी बनाया है रावण ने। अब सब रावण मत पर चल रहे हैं। ईश्वर को कोई जानते नहीं। ऊंचे ते ऊंची मत उनकी गाई हुई है। अब तुम आये हो नई दुनिया के लिए तकदीर जगाने। मनुष्य तो सब पुरानी दुनिया के लिए मेहनत करते हैं। तुम जानते हो अभी इस पुरानी दुनिया के विनाश के लिए महाभारत लड़ाई है। परन्तु विनाश होने के पहले नई सृष्टि भी चाहिए। अब बाप नई सृष्टि रच रहे हैं। तुम सब हो ईश्वर की सन्तान। पहले आसुरी सन्तान थे। अभी सदा पावन की सन्तान बने हो - सुखधाम का वर्सा पाने अर्थात् देवता पद पाने। तुम बेहद के बाप से तकदीर बनाने आये हो। बाप तुम बच्चों को बेहद का सुख देने फिर से आया है। भारतवासी बिल्कुल कौड़ी तुल्य बन पड़े हैं। अब राजा कोई नहीं, प्रजा का प्रजा पर राज्य है। देवी-देवता जो पवित्र थे, अब पतित बन पड़े हैं। गाते हैं पतित-पावन आओ। रावण को जलाते हैं परन्तु रावण जलता नहीं। सतयुग में थोड़ेही जलायेंगे। सतयुग में वर्ल्ड ऑलमाइटी अथॉरिटी देवी-देवताओं का राज्य था। इस समय सब नर्क-वासी बन पड़े हैं। अब इस पार से उस पार जाना है। खिवैया एक ही है, वह आकर विषय सागर से क्षीर-सागर में ले जाते हैं। यहाँ के साहूकार लोग समझते हैं हम तो स्वर्ग में हैं। जो गरीब हैं वह नर्क में हैं। उनको मालूम नहीं स्वर्ग किसको कहा जाता है। तुम जानते हो सतयुग में था पारसनाथ और पारसनाथियों का राज्य। बेहद के बाप को तुम पहचान कर बाप कहते हो तो जरूर वर्सा मिलना चाहिए। तुमको यह याद रखना है कि हम शान्तिधाम के वासी हैं। परमधाम से यहाँ आये हैं पार्ट बजाने। 84 जन्म कैसे लेते हो - यह बाप बैठ सारा हिसाब समझाते हैं। बाप कहते हैं - बच्चे, अब कलियुग का अन्त है। यहाँ तुम बाप से सहज योग सीख रहे हो। तुम कहते हो - बाबा, हम सूर्यवंशी घराने में जरूर आयेंगे। यह एम ऑब्जेक्ट है। यह पाठशाला है भगवान की। भगवानुवाच - बच्चे, मैं तुमको मनुष्य से देवता बनाने आया हूँ। तुम राजाओं का राजा बनो। मातेले बन पूरा वर्सा लो। श्रीमत पर चलेंगे तो श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ बनेंगे। बाप है ऊंचे ते ऊंचा। निराकार भगवान, न साकारी, न आकारी। आकारी है ब्रह्मा-विष्णु-शंकर देवतायें। उनको भगवान नहीं कहा जाता है। भगवान है एक, भक्त हैं अनेक। बाबा पूछते हैं भक्त कितने हैं? 5-6 सौ करोड़। भक्ति मार्ग वाले भक्त अब धक्के खा रहे हैं। कोई कहाँ, कोई कहाँ। तुम सब ड्रामा के एक्टर्स हो तो ड्रामा के क्रियेटर, डायरेक्टर का मालूम होना चाहिए। परन्तु कुछ भी नहीं जानते। सतयुग में सूर्यवंशी देवतायें थे उन्हों की महिमा गाते हैं। हैं तो दोनों मनुष्य फिर उन्हों की महिमा क्यों गाते हैं? क्योंकि उन्हों को ईश्वर ने ऐसा बनाया है। तुमको भी बाप मनुष्य से देवता बना रहे हैं। फिर तुम देवता से क्षत्रिय... आदि बनेंगे। नई दुनिया में रहने वाले देवतायें फिर पुरानी दुनिया में तमोप्रधान पतित बन जाते हैं। बाबा आकर फिर लायक बनाते हैं। कौड़ी से हीरे जैसा बनाते हैं। तुम्हारे में कोई अच्छी रीति पहचानते हैं कोई सेमी। सेमी को सौतेला कहा जाता है। निश्चय नहीं करते कि बाबा हम जरूर पवित्र बन पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे। मददगार नहीं बनते। पहले तो मात-पिता का बनना पड़े। बाबा हम आपके थे फिर आधा कल्प बाप को भूल माया के वश हो गये। अब फिर आपके बने हैं। इस पतित दुनिया में पतितों का ही मान है। स्वर्ग में ऐसी कोई बात नहीं होती। बाबा ने समझाया है स्वर्ग में शरीर छोड़ने के पहले साक्षात्कार होता है। अभी हम यह शरीर छोड़ जाए बालक बनेंगे। शरीर की आयु पूरी हुई है। अकाले मृत्यु होता नहीं। पुराना शरीर छोड़ नया ले लेते हैं। सर्प का मिसाल, भ्रमरी का मिसाल... भ्रमरी में भी अक्ल है। आज के मनुष्य में यह अक्ल नहीं रहा है। तुम सच्ची-सच्ची भ्रमरियाँ हो। वैरायटी कीड़ों को भूँ-भूँ करके मनुष्य से देवता बनाती हो। तुमको बाप सुखी बनाने आया है। सहज योग सिखलाने आया है। बाप ने राजयोग कब सिखलाया था, यह कोई नहीं जानते इसलिए बाप कहते हैं - बच्चे, तुम मेरी मत पर चलकर श्रेष्ठ बनो। इस समय सबकी आसुरी मत है। सर्व-व्यापी के ज्ञान ने भारत को बिल्कुल कौड़ी मिसल बनाया है। कर्जा लेते रहते हैं। भगवान कौन है, कहाँ रहते हैं - मनुष्य कुछ भी नहीं जानते। वह तो निराकार है फिर यहाँ कैसे ढूँढते हो। भगवान कहते हैं तुम कहते हो हम शिवानंद के फालोअर्स हैं फिर उनको फालो कहाँ करते हो। आजकल उन्हों का कितना मान है। परन्तु श्रीमत तो एक ही परमपिता परमात्मा की गाई हुई है। अब तुम आये हो ईश्वर की मत पर चल ईश्वर से वर्सा लेने के लिए। बाप कहते हैं जो धक्के खाते हैं वह मुझे नहीं जानते हैं। उनको पता ही नहीं कि बाप पढ़ाकर वर्सा दे विश्व का मालिक बनाते हैं। तुम अभी धक्का खाने से छूट गये हो। भगवानु-वाच - तुम्हें देवता बनाने आया हूँ। तुम बी.के.जानते हो भगवान आकर बच्चों को विश्व के मालिकपने का वर्सा देते हैं। तुम पुरुषार्थ से विश्व के मालिक बनते हो। बाप है विश्व का रचता। अब तुमको धक्का नहीं खाना है। धक्के खाने वाले को भगवान नहीं मिलता है। तुम तो बाप से सुख का वर्सा लेते हो। बाकी सबको शान्तिधाम का वर्सा मिल जायेगा। अब दु:ख का खाता खलास कर सुख का जमा करते हो। बाकी सब सजा खाकर अपने-अपने सेक्शन में चले जायेंगे। बच्चों ने गीत सुना। नई दुनिया के लिए नई तकदीर बनाने आये हैं। वही तकदीर फिर 21 जन्म पूरा होने से पुरानी बनती है। अब पुरुषार्थ करना है - चाहे सूर्यवंशी राज्य लो, चाहे साहूकार प्रजा बनो, चाहे गरीब प्रजा बनो। प्रजा भी बहुत साहूकार होती है जो कई राजे लोग भी उन्हों से कर्जा लेते हैं। अभी भी प्रजा साहूकार है। सतयुग में ऐसे नहीं होता। जो पिछाड़ी में राजा-रानी बनते हैं उनसे प्रजा में बहुत साहूकार होते हैं। बड़े-बड़े महलों में रहते हैं। अब जो चाहे बनो। अभी सब दु:खी हैं, बाबा आये हैं तुमको स्वर्ग में सदा सुखी अथवा स्वर्गवासी बनाने। इस समय नर्क के वासी फिर भी जन्म नर्क में ही लेंगे। तुम स्वर्गवासी बनने का पुरुषार्थ कर रहे हो। बाबा के शरीर का कोई नाम नहीं है। मनुष्यों को 84 जन्म में 84 नाम मिलते हैं। भिन्न नाम, रूप, देश, काल। शिवबाबा को न आकारी, न साकारी शरीर मिलता है। कहते हैं मैं लोन लेता हूँ। आता तब हूँ जब इनकी वानप्रस्थ अवस्था होती है। यह ड्रामा सेकेण्ड बाई सेकेण्ड शूट होता जाता है। हम तुम कल्प पहले मिले थे, अब मिले हैं, फिर मिलेंगे। जो सेकेण्ड बीता सो ड्रामा। बाप भी ड्रामा के बंधन में बाँधा हुआ है। बाप कहते हैं तुम बच्चों को आकर हीरे जैसा बनाता हूँ। मैं तुम्हारा मोस्ट ओबिडियेन्ट, मोस्ट बिलवेड फादर, टीचर और सतगुरू भी बनता हूँ। मेरा कोई बाप, टीचर, गुरू नहीं। सबका बाप मैं स्वयं हूँ। नॉलेजफुल हूँ। मेरा कोई गुरू नहीं। स्वयं सबका सद्गति दाता हूँ। अच्छा! मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते। धारणा के लिए मुख्य सार:- 1) भ्रमरी की तरह भूँ-भूँ कर मनुष्य को देवता बनाने की सेवा करनी है। बाप की श्रीमत पर सदा सुखी बनना और बनाना है। 2) ऊंच तकदीर बनाने के लिए पावन जरूर बनना है। सबको विषय सागर से क्षीरसागर में ले चलने के लिए बाप समान खिवैया बनना है। वरदान:- रूहानी प्रसन्नता के वायब्रेशन द्वारा सर्व को शान्ति और शक्ति की अनुभूति कराने वाले सर्व प्राप्ति स्वरूप भव जो परमात्म प्राप्तियों से सम्पन्न, सर्व प्राप्ति स्वरूप बच्चे हैं, उनके चेहरे द्वारा रूहानी प्रसन्नता के वायब्रेशन अन्य आत्माओं तक पहुंचते हैं और वे भी शान्ति और शक्ति की अनुभूति करते हैं। जैसे फलदायक वृक्ष अपने शीतलता की छाया में मानव को शीतलता का अनुभव कराता है और मानव प्रसन्न हो जाता है, ऐसे आपकी प्रसन्नता के वायब्रेशन अपने प्राप्तियों की छाया द्वारा तन-मन के शान्ति और शक्ति की अनुभूति कराते हैं। स्लोगन:- जो स्मृति स्वरूप रहते हैं उन्हें कोई भी परिस्थिति खेल अनुभव होती है। #brahmakumaris #Hindi
- 20 May 2018 BK murli today in English
Brahma Kumaris murli today in English Murli today - BapDada - Madhuban - 20/05/18 Madhuban Avyakt BapDada Om Shanti 01/12/83 The three rights of happiness, peace and purity. Today, BapDada is seeing His loving, long-lost and now-found beloved children. Each child has reached his home to celebrate a meeting with deep love. This land is said to be your home, the doorway of the Bestower. This praise belongs to this sweet home. The sweetest Father is celebrating a meeting with His sweet children in the sweet home. Today, BapDada is especially seeing three lines of special rights on the forehead of each child. There are three lines on each one’s forehead because each one is a child. In terms of being His child, everyone has rights, but they are numberwise. In the case of some children, their fortune and the line of their right to happiness are very clear and deep. No matter how many adverse situations arise or how many waves of sorrow come to create sorrow in them, they are ignorant of the word "sorrow". Even in adverse situations, with the rights attained from the Ocean of Happiness, with the enlightenment of the knowledge of "Wah, sweet drama! Wah, the part of every actor!" and with the happiness of their rights, they transform any sorrow into happiness. With their rights, they transform the darkness of sorrow, they become master bestowers of happiness and they not only constantly swing in the swings of happiness themselves, but also become instruments to give vibrations of happiness to others. In this way, the lines of their right to happiness are very clear and deep and so no one can erase them. Those who try to erase them would change, but they themselves wouldn't. They take a drop of happiness from the master bestowers of happiness. Baba saw those with these types of lines. This is called being number one fortunate. You were told that the sign of number one is to win. The second line is that of peace. All of you believe peace to be your original religion, do you not? This is what you tell everyone, is it not? What has been said in terms of religion? "You will not renounce your religion even if you have to die." You may lose your head but you won't let go of your religion. Those who have a right to the inheritance of peace and happiness can never let go of peace. Those who make peaceless ones peaceful, who constantly give rays of peace to others, can never let go of their religion of peace or their right to peace, no matter what happens. This is called being number one in the line of the second right. The third is the line of the right of purity. All children are pure souls. Nevertheless, which child has the fortune to claim the number one right? One through whose behaviour and face one can experience the personality of purity and royalty. In worldly life too, worldly personality and royalty are visible, but spiritual personality and the royalty of purity are visible in the fortunate children. This is called the line of the number one fortune of purity. Today, Baba was seeing these lines of rights of all the children. All of you can also see your lines of rights, can you not? Check whether you have attained all three rights. Have you claimed the full right or a percentage of it? If you have even a percentage at the confluence age, there will be a percentage throughout the cycle. There will be a percentage of the worthy-of-worship status. There won't be full worship, and there will be a percentage even of the reward. Achcha. Today, the majority are new ones (in knowledge) and so old ones. Call yourselves new children or the children who have a right every cycle, you have come to your place once again to claim your rights. Who has the greatest happiness? Each one of you would think "I have!". Do you believe this? Or is it that some have greater happiness and others have less? Even BapDada has to come especially to give the children who have all rights a right to a special meeting. Does the Father have greater love for the children or do the children have greater love for the Father? Who has unbroken love? BapDada places the children ahead of Himself. Children first! If the children didn't remember Him or love Him, to whom would the Father respond? This is why the children are at the front and the Father is behind them. The children always have to be made to walk at the front and the Father walks behind them. This is why BapDada is also pleased to see such children. There are even such children who are merged in unbroken love. There is also a rosary of such children. Whether in this land or abroad, in both places, there are such children who can't remember anything except the Father and service. BapDada meeting Jagdishbhai: You saw such children, did you not? You had a good tour, did you not? You put into the corporeal form the special blessing you received from corporeal Baba. You experienced success as your birthright, did you not? Out of all kinds of success, what is the sign of special success? The elevated success is that BapDada becomes visible. When the Father is visible in you, that is elevated success. This is the means of revelation. Whoever goes on a tour, to be able to give the experience of being equal to the Father is the sign of success. As you progress further, this is the sound that will continue to spread everywhere even more. When a child has courage, the Father definitely helps. Karavanhar (the One who acts through others) makes it happen. Achcha. To those who are always completely fortunate, to the rightful children who have total rights, to those who constantly stay in the combined form of “the Father and I”, to the lucky and lovely children who constantly remain merged in the Ocean of Love, love, remembrance and namaste from the Bestower of Fortune and the Bestower of Blessings. (Jagdishbhai gave BapDada news of the tour abroad and gave personal remembrance by name of all the brothers and sisters). The news of everyone's love continues to reach BapDada and it has reached even now. BapDada especially congratulates all the children abroad in all the different places. Congratulations for what? In transforming your sanskars, language and way of life, the majority of you have been intense effort-makers. It is as though someone goes away to a completely new world. You adopt new systems and customs and relationships and, even then, you always move along whilst considering yourselves to be the rightful souls of the previous cycle. Therefore, special congratulations on being able to transform yourselves. You remember BapDada with so much love and that always reaches BapDada. You even forget yourselves and always remember the Father in everything; this is the special transformation. You move along on the basis of this love. You sustain this love. The sustenance of subtle love makes you move forward. Achcha. To all those who have sent love and remembrances, the Father, the Ocean of Love, is also giving aprons full of love to all of them. The children from Bharat are no less. The people abroad become happy when they sing about the fortune of Bharat. It was because the people of Bharat awoke that they were able to awaken those abroad. It is those from Bharat who awoke. If all of you didn't exist abroad, how could there have been so many centres? This is why you have all been spread everywhere. You open a centre in such a short time. You take birth, you grow up a little and you open a centre. You do that standing on your own feet and not depending on anyone. You don't even have the support of waiting for an invitation. You use everything you have in a subtle and physical way and open a centre whilst keeping courage. However, it is the responsibility of all of you to sustain them. They do not lack courage. However, to give help is also the task of all of you as well as the Father. They became happy when they listen to the depths of knowledge. They move along on the basis of yoga and love. However, to go further into the depths of knowledge will make them instruments for further service. The depth of knowledge is required to prepare the mind. The result of being able to give the experience of knowledge and the Father is good. When anyone goes there, they become so happy. Their experience is as though a star from the sky has come down to earth. Achcha. BapDada speaking to Dadiji and Dadi Janki: The third image (Didi) is merged in both of you. You are equal to the Father. It is not that you have to become that, you already are. Do you experience this? Just as the Father takes the support of Brahma to do service, in the same way, you are also instruments for the Father. At the present time, the Father, Karavanhar, is enabling His task to be carried out through the instruments. You are special instruments. He is enabling the task to be carried out through Brahma in the subtle form and through you in the corporeal form. BapDada gives you love and remembrance even more times than multi-million times every second. You are the decoration. You are the special decoration of the Father and of Madhuban. BapDada is pleased to see you at every moment. Achcha. Plan to serve the leaders of religions: That form is especially needed to serve the leaders of religions, because they too are clever when it comes to matters of religion. They also listen to you with love, but they themselves lack the practical aspects. Let them have a vision of what you were told today, let them experience practically that those in front of them are not ordinary and they will then bow down. They bow down to experience, not to words. They would say that you too are doing a very good job and that you should also continue to receive blessings. They will make you happy by saying this, but let them consider you to be special. To strike someone at their weak spot is to gain victory. It is remembered in the scriptures that the deities attained victory when they became aware of the weak spot (of their opposition): this is also a matter of spirituality. So, the leaders of religions will also definitely come, but only when they see something new. Now, they simply say that the knowledge is good, that you are good and that they are also good. However, it has to emerge through their lips that this is the only way. There are many paths and yours is just one of them; this has to change. When they are touched that it is only here they can receive liberation and liberation-in-life, they will then bow down. So, now there has to be some newness. You have now become engaged in households. However, just as you tell others that, whilst being in a household, they have to remain detached from it, also teach yourself this lesson every day. The households are going to increase, but you have to remain detached from them whilst living in them. You will have to pay a little more attention and underline this. Each one of you has become busy in your own service, but there has to be the intoxication of the unlimited world. Whilst looking after all of that, let your intellects remain free for unlimited service. The body, mind, wealth and intellect remain engrossed in the creation a lot more. You saw corporeal Baba. Even whilst looking after his business, he kept himself free. He never allowed any name or trace of being busy to show on his face. Even though he had responsibility for the Brahmin family, what did he have in his intellect? The unlimited – that he had to give power and sustain them. His only concern was that he had to awaken souls. So, this is what needs to happen now. This is still lacking. The especially beloved children have to get together and create such an atmosphere. Each one of you is a lighthouse equal to the Father. Wherever you go, let others receive light, power and zeal and enthusiasm. You mustn't do what ordinary souls do. The words, thoughts, vision and attitude of corporeal Baba were unique; they were not ordinary. Therefore, create such a stage. This is why service is still at a standstill. There is so much expense and hard work and yet, how many emerge? Now, according to the time, even the advance party is becoming stronger. So those in the corporeal form have to be even faster. Everything is to happen suddenly. You won't be given a date. Test papers will definitely come. Some will even come to check your thoughts. They will come to test you. The more that revelation takes place, the more papers will come. They will come practically to check your lives and see what the difference is between your yoga and other yogas and between your knowledge and other knowledge. They won't check your words. For this, so much preparation has to be done in advance. Something or other will happen in ’84. Test papers will also come. This is a means to prepare for spreading the word. In the early days, you used to practise walking in such a way that even though the body was moving, others would feel that a light was going by, and they wouldn't see the body. When you first went to your friends and relatives, what was the test paper you had? That they should not see your body, but a light. That they should not see you as their daughter, but as a goddess. You took this test, did you not? If they saw you in the form of your relationship with them, as their daughter, then you failed. So such practice is needed for this. Very bad times are coming, but your stage has to be such that others always see a form of light; this is your safety. As soon as they enter, let them see a fortress of light. Why should your wealth that could be used for Godly service be wasted just like that? Let them not see a cupboard, but a fortress of light instead – there has to be this much practice. The splendour of the form of a Shakti has to be increased. Have the aim that you do not appear ordinary. There will be many types of attack – through wandering souls, through those who have impure vision, through calamities and illnesses, but the way to be protected from all of those is to become very special, that is to be able to do what others cannot do. Simply remember that you are very a special soul and you will remain loving and detached. Achcha. For the success of the ’84 Conference: For as much as possible, let there be an atmosphere of silence. Let those who come here return with the experience that this is God’s knowledge and God’s place. Let there be such an atmosphere in which you have the aim of giving an experience. Don’t get involved in just giving interesting points but, whilst speaking, continue to give them an experience. Keep the aim of making everyone say that this is the path to God and that God has come. They already say that this is very good, but now let them say that God is teaching you. They say that the knowledge is good, but now let them experience who the Bestower of Knowledge is. Now lay this foundation. Completion will take place when the Seed comes up above. If the Seed hasn’t come up yet, how can the tree be transformed? Since they are coming to this place out of their own interest, then let them see and experience the speciality of this place. You mustn’t change your views on hearing their views, but you must now make such a plan that they change their views on experiencing your views. When you have the aim of giving a lecture, their attention is then drawn to the points. However, when you have the aim of revealing the Father, only the Father will be visible. As is your aim, so will be the result. Achcha. Blessing: May you be a master trikaldarshi (knower of three aspects of time) and become a conqueror of Maya by knowing the past, present and future. The children who know the three aspects of time can never be defeated by Maya because what the present is and what is going to happen in the future is very clear in the intellect of a soul who is a trikaldarshi. “What I am and what I am going to become” - they have the intoxication of both the present and the future. They continue to fly with the happiness of that intoxication and this is why their feet are always above the ground. They are not attracted to their bodies, bodily relations or old possessions of the body. Slogan: Those who have the virtue of easiness find it very easy to conduct themselves in a gathering. #brahmakumari #bkmurlitoday #Murli #english
- 28 May 2018 BK murli today in English
Brahma Kumaris murli today in English - 28/05/18 Morning Murli Om Shanti BapDada Madhuban Sweet children, in order to receive help from the Father and claim your full inheritance from Him, become real children. ‘Real’ means those who have total renunciation and make a promise of purity. Question: In what way is the Father full of mercy? What mercy does He constantly have for the children? Answer: No matter how many obstacles some children create, no matter how many bad deeds they perform under the influence of Maya, if they realize their mistakes, the Father gives them refuge and says: OK, try again. Remove your defects and become virtuous. The Father is full of mercy, because He knows that the children have nowhere else to go. The Father only wants the children to remain constantly happy. Song: The heart desires to call You. Om Shanti. Sweetest children, you can also be called gopes and gopis. There are no gopes and gopis in the golden age. It is a kingdom that exists there. Gopes and gopis exist at the confluence age, when Gopi Vallabh (Father of the gopis) comes. The Father is called Vallabh. Children remember the Father and say: Baba, come once again. The children at all the centres know that Baba must be speaking the murli at this time and that the murli is being recorded on a tape. It would also be written down and be reproduced by litho and sent to them. They will imbibe it and enable others to imbibe it. They know that the gopes and gopis in Madhuban must be listening personally to Gopi Vallabh and that they themselves will hear the same murli after four or five days. They must be having these types of thoughts. They say: Baba when You come, we will begin to smile constantly just as the deities remain constantly cheerful. There, the king, the queen and the subjects all remain cheerful. There is no name or trace of sorrow there. Here, it is government by the people. You children understand that Baba comes and teaches you. Here, it is the poor who study well, just as out of those poor people, one may become an MLA (Member of the Legislative Assembly) or an MP (Member of Parliament). Here, only the poor can study. It is the poor who become heirs. The rich have too many complications. Firstly, they have the intoxication of their wealth and secondly, they have no time and so they cannot sacrifice themselves. Here, you have to sacrifice yourselves with your minds, bodies and wealth. The hearts of the wealthy ones shrink; they have many other concerns. This is why the poor sacrifice themselves very quickly and, among them, it is the kumaris who come first. Mama too was a kumari. She belonged to the Father and said: Mine is Shiv Baba and none other. This is what is meant by sacrificing oneself. While living at home with your family, it is as though you are not there. Only the land of peace and land of happiness remain in your intellects. We are now going to our sweet home and then to our sweet kingdom. While living at home with your family, you have to sustain your creation, but on the basis of shrimat. Only when you sacrifice yourself can you receive shrimat. Only by having yoga with the Almighty Authority can you receive power. If you do not belong to the Father, you cannot receive power. There are real children and there are stepchildren. Even among sannyasis, there are real ones and step ones. Some renounce their homes and families and put on saffron-coloured robes; they are real ones. There are others who are just followers; they live at home with their families; they are said to be step ones; they cannot be called real ones. They cannot receive an inheritance because they remain impure. Here, too, there are real ones who have a rakhi of purity tied. Those who do not remain pure cannot be said to be real children. This is renunciation through Raja Yoga, whereas that renunciation is through hatha yoga. Baba has explained how people call themselves followers of the sannyasis and yet they still live at home with their families. In fact, they can neither be called followers nor sannyasis. They want to make effort for renunciation, but they have bondages. Only those who had renunciation in the previous cycle will have renunciation again. They become real ones whereas others are that in name only. Here, those who belong to the Father are real children. It is the real children who receive help and the inheritance. Step ones cannot receive help. Baba has explained that this is the Court of the knowledge of Indra. Here, all are angels of knowledge. There is great praise of the nine jewels. People wear a ring of nine jewels. Brahmin priests say: Wear this so that your omens can change. They have even praised the gems. In fact, you children are those gems. You children become part of the rosary of victory to the extent that you become serviceable. Baba, who makes you into highest-on-high diamonds, is placed in the centre. Human beings don’t know about such things. They don’t know who the nine jewels are and why they are compared to gems. In the same way, you are compared to rivers; you are rivers of knowledge, whereas others are of water. Therefore, you say: Baba come, so that we can remain constantly cheerful. We will listen to Your murli and explain it to others. Yes, we will then become princes and princesses and play flutes studded with diamonds. There is the desire to play the flute. Krishna too surely had a flute and used to dance when he was a prince. However, to play or speak the murli of knowledge is the task of the Ocean of Knowledge alone. The Father comes and plays the flute of knowledge. Matters of knowledge only apply here. There, there is no question of knowledge. It is you daughters who play this murli (flute) now. There is no knowledge of the three aspects of time in the golden age. There, this knowledge will have disappeared; it does not continue eternally. At that time, there is only the reward. Knowledge is only received once. You are now attaining your reward for 21 births. Once you have attained your reward, Baba goes and sits in the supreme abode. Once I have made you into the masters of the world through knowledge and the power of yoga, I go and sit beyond sound. No one knows Me there. No one can know Me, the Creator, or My creation. They neither know the Father nor the beginning, the middle or the end of the world. This knowledge does not remain there. If Radhe and Krishna were to know that they later had to become 14 celestial degrees, the happiness of the kingdom and the crown would disappear. This knowledge does not exist there. The Father explains everything very clearly. You are renunciates and they too are renunciates. However, their renunciation is through hatha yoga. Those sannyasis renounce their limited homes and families. There, there is Shankaracharya, whereas it is Shivacharya here. Shiv Baba is the Ocean of Knowledge. He is called the Teacher. Krishna is not a teacher. God Shiva, the Teacher, sits here and explains to you children. He teaches you Raja Yoga. Those are hatha yogis; they cannot teach Raja Yoga. Only the unlimited Father can teach Raja Yoga for attainment of the kingdom of the golden age. You have now come to the Father. Those people adopt renunciation for birth after birth, whereas you do not have to renounce anything for 21 births. You understand that this is the old world and that you are now kicking it away. Shiv Baba has explained two types of pilgrimage: One is the spiritual pilgrimage and the other is the physical pilgrimage. The Supreme Father says: I take you on a pilgrimage and you will not return to the land of death. The Father is the Supreme Guide. His children are also guides. You are spiritual guides who enable souls to go on this spiritual pilgrimage. These are things to imbibe. You children imbibe these well and explain them to others. There are some who do not have accurate yoga. Although they imbibe knowledge very well, their yoga is not constant. Maya doesn’t interfere in knowledge, she only interferes in yoga. It is the same as when a speech is being given on the radio during wartime and they jam the transmission to stop it being heard. Similarly, where there is a disturbance, Maya interferes in yoga. The name ‘yoga’ is very famous in Bharat. Who taught this ancient yoga? They have said that it was God Krishna who taught it. Krishna only exists in the golden age. Then his name, form, place and time period continue to change. Now, in his final birth, the Father enters him and makes him that again. You know that Brahmins become deities, who then become warriors, merchants and shudras. The Father sits here and explains: Whatever knowledge I am giving you will disappear. I give it to you through this one. So, the foremost river is Brahma. A mela (gathering) takes place at the confluence of the Brahmaputra River and the ocean. This Brahmaputra is a big river who imbibes knowledge and enables others to imbibe it. It is true that God has changed His form and come. He changes His incorporeal form and comes into the corporeal. The Brahmin clan is the highest of all. The Father gives knowledge to Brahmins through the lotus lips of Brahma and creates the deity and warrior religions. There are no other religions in the golden and silver ages. They are being established now. Radhe and Krishna become Lakshmi and Narayan. Those who have studied will definitely come into the golden age, because the imperishable knowledge can never be destroyed. Many subjects are created. Some leave and go on a tour and then return. Where else would they go? There is only the one Flame for the many moths and so they will keep returning to the Flame. Those who have run away will also return. Although they defame the Satguru, they still come back to Baba. It is then explained to them that they can take up this knowledge again. They feel that it is definitely their mistake. Therefore, they also have to take refuge and they too have to be served. Continue to have full mercy until the end. No matter how many obstacles they create, they are still told: By all means come and try again. You are not forbidden to come. Baba is full of mercy anyway and you are His children, are you not? They say that Maya made them wander around. However, they are still served. If they seek refuge, they have to be uplifted. Remove their defects and make them virtuous. The Father can never become an enemy. The unlimited Father would say: Children, remain happy! He feels mercy for them. Where else would they go? There is no other place where they can claim their inheritance from the Father. The Father explains everything. If you cannot imbibe very much, then even a little will do. Achcha, manmanabhav! Stay in remembrance of the Father! Peace is the original religion of souls. Attention please! Remain cautious! Remember your Father! By remembering the Father, you will definitely remember the inheritance; it is impossible for you not to remember the inheritance. By remembering the Father and the inheritance you become liberated in life. It is such an easy thing! The name given is ‘Easy Raja Yoga’. People become confused when yoga is mentioned. This means to remember the Father. Baba says: O children, you forget the Father! You forget the Father who gives you a birth as valuable as a diamond! Do you ever forget your worldly father? If you forget Baba, you lose your inheritance. Have the faith that you are a soul and remember the Father. You are deceived when you become body conscious from soul conscious. The path of sannyasis is the path of isolation. When Bharat starts to become impure, they come and help it by slowing down the progress of impurity. They have the power of purity. Where there is purity, there is also peace and prosperity. A kumari is pure, this is why people bow to her. They all bow their heads in front of the deities (idols) because they were pure. There is no question of bowing one’s head in the golden age because everyone there is pure. Look at yourself in the mirror to see that you don’t have any evil spirit in you. Have you become worthy of marrying Lakshmi or Narayan? You have to make yourself worthy. You children understand that Shiv Baba is the Highest on High. Shiv Baba is higher than everyone, including Brahma, Vishnu, Shankar and Lakshmi and Narayan etc. Only one Shiv Baba is like a diamond. All the rest are tamopradhan and worth shells. All praise belongs to the one Father alone. It is the Father’s task alone to make the whole world into heaven. Achcha.To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children. Essence for Dharna: 1. Sacrifice yourself fully to the Father and become a real child of the Father and claim your full inheritance from Him. Become completely pure. 2. Look at yourself in the mirror and remove any evil spirits and become virtuous. Listen to the Father's murli and imbibe it and enable others to imbibe it. Blessing: May you be a victorious jewel who remain unshakeable in the midst of upheaval by having faith in the intellect. Faith and victory are firm companions of each other. Where there is faith, victory is definitely guaranteed because you have the faith that the Father is the Almighty Authority and that you are a master almighty authority. So, where else would victory go? Those who have such faith in the intellect can never be defeated. When the foundation of faith is strong, no storms can shake you. To remain unshakeable in the midst of upheaval is known as being a victorious jewel by having faith in the intellect. However, do not have faith in just the Father, but let there be faith in yourself and also in the drama. Slogan: A flying bird is one who remains free from all bodily relations and continues to make effort to become an angel. #english #Murli #bkmurlitoday #brahmakumari
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